ग्रैंड पेरेंट्स डे : जिंदगी की बगिया के बागबां होते हैं दादा-दादी, नाना-नानी...

ग्रैंड पेरेंट्स डे : जिंदगी की बगिया के बागबां होते हैं दादा-दादी, नाना-नानी...

Deepak Sahu | Publish: Sep, 09 2018 04:32:58 PM (IST) | Updated: Sep, 09 2018 04:32:59 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

दादा-दादी या नाना-नानी रिश्तों की बगिया के वे बागवां होते हैं, जो हर दिन अपने परिवार को सहेजते हैं

रायपुर रिश्ते हमें बांधे रखते हैं, भटकने नहीं देते। घर में माता-पिता का प्यार वो अहसास है, जो हमें संवारता है, लेकिन हमें संवारने वालों में शिखर पर होते हैं हमारे ग्रेंड पेरेंट्स।

दादा-दादी या नाना-नानी रिश्तों की बगिया के वे बागवां होते हैं, जो हर दिन अपने परिवार को सहेजते हैं। बच्चों का दादा-दादी से अलग ही लगाव होता है। जब कभी कहानियां सुनने का मन हो, तो दादी की ही याद आती है और पापा के गुस्से से बचने के लिए दादाजी के पीछे बच्चे छुप जाते हैं। सही मायनों में देखा जाए तो बुजुर्ग ही घर की शान होते हैं। आज का दिन दुनिया में ग्रेड पेरेंट्स डे के रूप में मनाया जाता है, एेसे में आज हम रूबरू करा रहे हैं शहर के ऐसे परिवारों से जो दादा-दादी, नानी-नानी से समृद्ध हैं...

 

grand parents day

जिंदगी की खुली किताब हैं नाना-नानी
शंकर नगर निवासी राम प्रजापति का कहना है कि वे अपने दादा-दादी के बहुत करीब हैं और हमेशा उनके ही करीब रहे हैं। वे बताते हैं कि कोई भी काम होता था, तो वह उनके पास ही बैठकर करते थे। यहां तक कि नानी की बताई हुई बातें आज भी तरोताजा हैं। मेरे नाना-नानी जिंदगी की खुली किताब की तरह हैं। वे आज तक कुछ नहीं छिपाते, जो भी किया है, हम लोगों की भलाई के लिए ही किया है।

 

grand parents day

दादा-दादी के साथ लगता है अच्छा
कविता नागर का कहना है कि वे घर में जब भी आती हैं, तो नाना-नानी के साथ ही बैठना बहुत अच्छा लगता है। पापा बताते हैं कि जब हम दोनों छोटे थे, तब रात को मम्मी के यहां से उठकर नानी के पास चले जाते थे। आज भी पापा अगर गुस्सा हों, तो नानाजी आकर समझाते हैं कि बच्ची है गलती हो जाती है। सही मायनों में मेरे घर की रौनक मेरे नाना-नानी हैं।

न्यू राजेन्द्र नगर निवासी सुंदरलाल पाण्डेय अपनी पोती अक्षिता और काव्या के साथ।

MP/CG लाइव टीवी

Ad Block is Banned