लॉकडाउन में कुम्हारों की जिंदगी से गायब हो गई खुशियां, नहीं मिल रहा मिट्टी का मोल

आधुनिकता की अंधी दौड़ व उसकी चकाचौंध ने पारंपरिक व्यवसायों को लोगों ने खत्म तो कर ही दिया है।

By: dharmendra ghidode

Published: 10 May 2020, 05:09 PM IST

नवापारा-राजिम. आधुनिकता की अंधी दौड़ व उसकी चकाचौंध ने पारंपरिक व्यवसायों को लोगों ने खत्म तो कर ही दिया है। वहीं कुछ लोग पारंपरिक रिवाज के चलते मिट्टी के बर्तन अभी भी ले रहे हैं। मगर बीते 45 दिनों के लॉकडाउन के चलते कुम्हार ना तो ये बर्तन बना पा रहे हैं और जो बने हैं वो ना ही बिक पा रहे हैं। व्यवसाय खत्म होने के कगार पर हैं, जैसे कुम्हारों का मिट्टी के बर्तन बनाना , कसेरों द्वारा कांसे के बर्तन बनाना, लोहारों का लोहारी कार्य, बुनकरों का बुनकर कार्य, कहारों द्वारा डोली उठाना, सुनारों का सुनारी कार्य सहित कई समाजों के पारंपरिक व्यवसाय को वक्त की आंधी ने तबाह कर दिया है। उल्लेखनीय है कि मई का महीना चल रहा है काफ ी गर्मी पड़ रही है। इस गर्मी के मौसम में कुम्हारों की जिंदगी से खुशियों के रंग गायब हो गए हैं। दूसरों के जीवन में खुशियां बिखेरने वाले ये कुम्हार अब अपने पुश्तैनी काम से काफ ी तंग आ चुके हैं क्योंकि आधुनिकता व मशीनी युग ने उनके पुश्तैनी व्यवसाय को लील लिया है।
पारंपरिक व्यवसाय खत्म होने की कगार पर
मई का महीना जो कि शादी-ब्याह का महीना होता है और इस महीने में अन्य व्यवसायों की तरह इनके व्यवसाय की भी काफ ी पूछ परख रहती है। लेकिन इस बार इनके व्यवसाय में सन्नाटा पसरा हुआ है। लॉकडाउन की वजह से शादियां रद्द होने के चलते इनके व्यवसाय को काफ ी नुकसान पहुंचा है। इसी प्रकार गर्मी के इस चिलचिलाती धूप में पहले जगह-जगह सार्वजनिक संस्थाओं के द्वारा प्याऊ घर खोले जाते थे, जिनके लिए लोग कुम्हारों से ही घड़े खरीदते थे। वहीं अब जगह-जगह लोगों के द्वारा वाटर कूलर लगा दिए गए हैं, जिससे इन कुम्हारों का व्यवसाय काफ ी प्रभावित हुआ है। हिंदू धर्म के अनेक संस्कारों में मिट्टी से बने बर्तनों का उपयोग होता है। दीपावली जिसे दीपों का त्यौहार भी कहा जाता हैं। इन मिट्टी के दीपों की रोशनी से सारा घर आंगन जगमग हो जाता है। छत्तीसगढ़ जिसे तीज त्यौहारो वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता हैं। मिट्टी का घड़ा जिसे देसी फ्रिज भी कहा जाता है और जिसका शीतल जल पीकर प्यासे कंठ की प्यास बुझ जाती है, गला तर हो जाता है। दूसरों के प्यासे कंठ की प्यास बुझाने वाले कुम्हार जाति के ये लोग आज खुद प्यासे हैं क्योंकि आधुनिकता के चलते लोगों ने मिट्टी के घड़ों की जगह फ्रि ज को अहमियत देना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर कहा जाय तो पुश्तैनी धंधे की दयनीय हालत के चलते कुम्हारों का जीवन संकट में है। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार कुम्हारों की पीड़ा समझते हुए उनकी मदद के लिए आगे आएगी?

dharmendra ghidode Desk/Reporting
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