कुम्हारों के चेहरे से खुशियां गायब, खत्म हो रहा पारंपरिक व्यवसाय

लॉकडाउन की वजह से शादियां रद्द होने से कुम्हारों के व्यवसाय को काफी नुकसान पहुंचा है। इसके चलते उनका अपने मुश्तैनी कारोबार में मोह भंग हो रहा है।

By: ashok trivedi

Updated: 12 May 2020, 11:31 PM IST

छुईहा. आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं उसकी चकाचौंध ने पारंपरिक व्यवसायों को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। वहीं कुछेक पारंपरिक व्यवसाय खत्म होने के कगार पर हैं, जैसे कुम्हारों का मिट्टी के बर्तन बनाना, कसेर (कंसारी) का कांसे का बर्तन बनाना, लोहारों का लोहारी कार्य, बुनकरों का बुनकर कार्य, सुनारों का सुनारी कार्य सहित कई समाजों के पारंपरिक व्यवसाय को वक्त की आंधी ने तबाह कर दिया है।
मई का महीना चल रहा है, काफी गर्मी पड़ रही है। इस गर्मी के मौसम में कुम्हारों की जिंदगी से खुशियों के रंग गायब हो गए हैं। दूसरों के जीवन में खुशियां बिखेरने वाले ये कुम्हार अब अपने पुश्तैनी काम से तंग आ चुके हैं क्योंकि आधुनिकता एवं मशीनी युग ने उनके पुश्तैनी व्यवसाय को लील लिया है।
मई का महीना जो कि शादी-ब्याह का महीना होता है और इस महीने में अन्य व्यवसायों की तरह इनके व्यवसाय की भी काफी पूछ परख रहती है, लेकिन इस बार इनके व्यवसाय में सन्नाटा पसरा हुआ है। लॉकडाउन की वजह से शादियां रद्द होने से इनके व्यवसाय को काफी नुकसान पहुंचा है।
इसी प्रकार ग्रीष्म के इस चिलचिलाती धूप में पहले जगह-जगह सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा प्याऊ घर खोले जाते थे, जिनके लिए लोग कुम्हारों से ही घड़े खरीदते थे। वहीं अब जगह-जगह समाजसेवियों या जनप्रतिनिधियों द्वारा वाटर कूलर लगा दिए गए हैं, जिससे इन कुम्हारोंं का व्यवसाय काफी प्रभावित हुआ है।
मिट्टी के घड़ों की जगह फ्रिज को दे रहे अहमियत
हिंदू धर्म के अनेक संस्कारों में मिट्टी से बने बर्तनों का उपयोग होता है। दीपावली जिसे दीपों का त्यौहार भी कहा जाता है इन मिट्टी के दीपों की रोशनी से सारा घर आंगन जगमग हो जाता है। छत्तीसगढ़ जिसे तीज त्यौहारों वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता हैं। मिट्टी का घड़ा जिसे देसी फ्रिज भी कहा जाता है और जिसका शीतल जल पीकर प्यासे कंठ की प्यास बुझ जाती है। गला तर हो जाता है, दूसरों के प्यासे कंठ की प्यास बुझाने वाले कुम्हार जाति के ये लोग आज खुद प्यासे हैं, क्योंकि आधुनिकता के चलते लोगों ने मिट्टी के घड़ों की जगह फ्रिज को अहमियत देना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर कहा जाए तो पुश्तैनी धंधे की दयनीय हालत के चलते कुम्हारों का जीवन संकट में है। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार कुम्हारों की पीड़ा समझते हुए उनकी मदद के लिए आगे आएगी।

ashok trivedi Desk/Reporting
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