नक्सलगढ़ की बेटी ने डर को बनाया पैशन, माउंटेन भागीरथी-2 पर्वत पर तिरंगा फहराकर बनाया इतिहास

कहावत भी है, डर के आगे जीत है... घर पहुंचने में भले ही लेट क्यों ना हो जाए लेकिन मंजिल को पाना ही है।

सुमित यादव@रायपुर. बचपन से ही मुझे स्पोट्र्स के क्षेत्र में बहुत ज्यादा रुचि रही है, लेकिन जीवन में अगर कुछ करना है तो डिफरेंट करना होगा। कहावत भी है, डर के आगे जीत है... घर पहुंचने में भले ही लेट क्यों ना हो जाए लेकिन मंजिल को पाना ही है। एेसा कहना है प्रदेश की पहली माउंटेनर नैना सिंह धाकड़ का। बस्तर की रहने वाली नैना सिंह ने हाल ही में उत्तराखंड में माउंटेन भागीरथी-2 पर्वत पर 6512 मीटर की चढ़ाई पूरी कर तिरंगा फहराया। वे प्रदेश की पहली लेडी माउंटेनर हैं जो देश में अपने नाम के साथ छत्तीसगढ़ का भी नाम रोशन किया। उनका अगला टारगेट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट है, जो वर्ष 2018 का लक्ष्य है। नैना की पत्रिका प्लस से बातचीत के कुछ अंश...

डर बना पैशन
जब मैं छोटी थी तो मुझे स्पोट्र्स बहुत पसंद था लेकिन हाइट से बहुत डर लगता था। कई बार एेसा होता था कि गांव के मेले में झूला भी झूलने से भी डरती थी, लेकिन आज वहीं डर मेरा पैशन है। इन सभी के साथ मेरी मां का बहुत साथ रहा है। सबसे ज्यादा कोई मुझे मोटिवेट किया है वो मेरी मां है। मुझे याद है कि जब मैं उत्तराखंड में भागीरथी-२ के माउंटेनिंग के लिए जा रही थी तो मन में थोड़ा डर तो था, लेकिन खुद पर एक विश्वास था कि मुझे कुछ करना है। उसी समय मुझे याद है कि मेरी मां का फोन आया तो मैंने उनसे यही बात कही कि मां घर पहुंचने में देर भले भी हो जाए लेकिन मंजिल को पाना ही है।

 

Naina Singh

दिक्कतें बहुत आईं लेकिन हिम्मत नहीं हारी
नैना बताती हैं कि जब स्पोट्र्स करती थीं तो उस टाइम हॉकी खेला करती थी। लेकिन एक समय के साथ गेम को छोडऩा पड़ा। परिवार का यही कहना था की बेटी बड़ी हो रही है तो छोटे कपड़े नहीं पहनेगी। जिसकी वजह से मैं इस गेम को छोड़कर बैंडमिंटन खेलना शुरू किया तो वहां भी सेम प्रॉब्लम फेस करना पड़ा। फिर मैं तय किया कि मुझे कुछ अलग करना है। तभी 2010 में एनएसएस कैंप द्वारा हिमाचल पर्वत में ट्रैकिंग के लिए भेजा गया। यह कैंप 15 दिन रहा। इस कैंप से मैंने सोच लिया था कि मुझे अब माउंटेनर बनना है। इसके साथ ही मैने कई पर्वतों की चढ़ाई की।

Naina Singh

कई रिकॉर्ड किए अपने नाम
वे बताती हैं कि वर्ष 2011 में टाटा स्टील में माध्यम से ट्रेंड डायरेक्टर रॉकी मार्टिन और शंकर पटेल द्वारा मेरा चयन भारत की पहली पर्वतारोही बछेंद्री पाल की टीम के साथ भूटान के स्नोमेन ट्रेक में शामिल किया गया। इस टीम में देश के अलग-अलग राज्यों से 12 महिलाएं पहुंची थीं। इस ट्रैकिंग को पूरा किया जो लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुआ। सन् 2012 में एचएमआई दार्जलिंग भेजा गया। 2013 में हिमालय अन्नपूर्णा रेंज को पूरी की। इसके बाद 2015 में अकेले माउंट आबू के स्वीम कंपलीट किया। 2017 में साथ ही भगीरथी-2 को पूर्ण करने से पहले एक माह के लिए उत्तराखंड सर्च एंड रेस्क्यू कोर्स किया और फिर उत्तराखंड में भागीरथी-2 को पर तिरंगा फहराकर प्रदेश की पहली माउंटेनर बनी।

चंदू निर्मलकर Desk
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