जिससे हम प्रेम करते हैं उसके प्रेम अधिष्ठान को जानना जरूरी

विवेकानंद आश्रम में संत मैथिलीशरण भाई ने सुनाई नवधा भक्ति

रायपुर. ज्ञान और भक्ति में कोई अंतर नहीं है। ज्ञान पूर्ण होने का और भक्ति पूर्ण होने का परिणाम एक ही होता है। जिसका मतलब है प्रेम और प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखना। भरतजी ने चित्रकूट जाकर श्रीराम से एक बार भी यह नहीं कहा कि आप अयोध्या वापस चलिए। उनकी भावना थी कि मैं अपनी इच्छा को प्रभु की भावना के ऊपर थोप दूं यह तो धर्म विरुद्ध है।
जब भरतजी भगवान की पादुकाएं लेकर अयोध्या पहुंचते हैं तब वे गुरु वशिष्ठ से यह पूछते हैं कि यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं नंदी ग्राम में इन पादुकाओं को विराजमान कर वहीं से अयोध्या का राजकाज चलाऊं।
रामकृष्ण मिशन विवेकानंद आश्रम में नवधा भक्ति पर प्रवचन देते हुए श्रीरामकिंकर विचार मिशन के अध्यक्ष संत मैथिलीशरण भाईजी ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि जिससे हम प्रेम करते हैं उसके प्रेम अधिष्ठान को जानना जरूरी है। तो गुरुदेव ने संसार के इतिहास में भरत का वह उत्तर दिया जो बिल्कुल अनोखा था। वे कहते हैं कि भरत! आज से हम जो भी निर्णय देंगे वह ग्रन्थ में देखकर नहीं, बल्कि तुम्हें देखकर देंंगे। अर्थात तुम जो समझोगे, कहोगे और जो भी करोगे वही धर्मसार होगा।
सृजन के लिए समर्पण जरूरी
कथाकार भाईजी ने कहा कि धर्म के उस अलौकिक रूप को समझ पाने की क्षमता समर्पण से आती है। जो मात्र भरतजी हनुमानजी और लक्ष्मणजी समझ पाए। जिनका अपना कोई संकल्प नहीं,अपितु जो प्रभु का संकल्प है वही उनका संकल्प है। द्वापर युग में श्रीकृष्ण के प्रति यदि इसी कोटि का समर्पण होता तो वहां भी कृष्ण राज्य बन गया होता। इसलिए सृजन के लिए समर्पण की आवश्यकता होती है।

Nikesh Kumar Dewangan Desk
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