नौकरी गई, मकान मालिक ने भी निकाला, 200 किमी पैदल चले, अब जमीन पर नहीं पड़ रहे पांव

बंजारी चौक पर सारंगढ़ जाने वाहन का इंतजार करते तेलंगाना से राजधानी पहुंचे कामगारों ने सुनाई आपबीती

By: Devendra sahu

Published: 16 May 2020, 06:24 PM IST

रायपुर . साहब, लॉकडाउन ने नौकरी छीन लिया। जैसे-तैसे एक माह गुजारा किए लेकिन घर का किराया नहीं देने पर मालिक ने बेदखल कर दिया। 200 किमी पैदल चले। वाहन चालकों का हाथ-पैर जोड़कर बीच-बीच में कुछ दूरी तय कर 4 दिनों में यहां पहुंचे हैं। अब तो जमीन पर पांव भी नहीं टिक रहे हैं। यह कहना है भनपुरी के बंजारी चौक पर सारंगढ़ जाने के लिए वाहन का इंतजार करते तेलंगाना से राजधानी पहुंचे कामगारों का। सारंगढ़ के रहने वाले दीपक ने बताया कि वह एक निजी फैक्ट्री में करीब 4 साल से काम कर रहे थे। लॉकडाउन की वजह से फैक्ट्री बंद हो गई।
मालिक ने भी बिना वेतन दिए चलता कर दिया। एक माह तक जैसे-तैसे परिवार के साथ जीवनयापन करते रहे। मकान मालिक ने भी घर खाली करने को कह दिया। भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर के लिए परिवार के साथ पैदल ही निकल पड़े। चार दिनों में धक्का-मुक्की खाते हुए यहां पहुंचे हैं। दीपक के साथ ही वाहन का इंतजार कर रहे सारंगढ़ के ही रहने वाले राकेश ने बताया कि वह कुछ माह पहले ही नौकरी के लिए तेलंगाना पहुंचे थे। एक ठेकेदार ने उन्हें काम पर लगाया था।
लॉकडाउन होते ही काम बंद हो गया तो ठेकेदार ने भी पैसा देने से इनकार कर दिया। घर से 1 हजार रुपए मंगाकर कुछ दिनों तक अपना काम चलाया। किराया देने के लिए पैसे नहीं बचे तो पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। उन्होंने बताया कि वाहनों को रोकने के लिए हाथ देते-देते अब इतने थक चुके हैं कि ऊपर ही नहीं उठ रहे हैं। राकेश, दीपक के साथ कुछ अन्य कामगार भी थे, जो डबडबाई आंखों से देख रहे थे। कामगारों का कहना था कि अब वह किसी तरह से घर पहुंच जाएं।
अब कभी नहीं जाएंगे परदेस
भनपुरी चौक पर एक वाहन से करीब 15 लोग उतरते हुए दिखे। पूछने पर उन्होंने बताया कि वह हैदाराबाद से आ रहे हैं। सभी बलौदाबाजार जिले के हैं। 15 लोगों में शामिल एक युवक ने अपना नाम संतोष बताते हुए कहा कि वह जिस कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत की उसने संकट के समय भूखों मरने के लिए छोड़ दिया। अब तो गांव में ही छोटा मोटा कामधंधा करके गुजर बसर कर लेंगे लेकिन दोबारा बाहर नहीं जाएंगे।
भूख से रो रही थी 20 दिन की मासूम
कामगारों के साथ एक महिला भी थी, जिसके हाथों में 20 दिन की एक मासूम बच्ची थी। बच्ची रो रही थी। उसकी मां उसे दूध पिलाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वह सिर्फ रोए जा रही थी। महिला से पूछने पर बताया कि लॉकडाउन में बच्ची पैदा हुई है। अभी नामकरण भी नहीं हुआ है। उसने बताया कि चार दिन हो गए भरपेट खाना खाए हुए। चिलचिलाती धूप में पैदल चलना काफी मुश्किल है लेकिन भूखों मरने से अच्छा है कि किसी तरह अपने गांव-घर पहुंच जाएं। महिला के साथ एक और 6-7 साल की बच्ची थी, जो कुछ खाकर अपना भूख मिटा रही थी।

Devendra sahu Desk
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