कश्तियां डूब रही हैं यहां एक-एक करके, और हम खुश हैं कि पतवार संभाले हुए

शायरों ने अपने एक से बढ़कर एक कलाम पेश कर खूब वाहवाही बटोरी। एक-एक हर्फ वजनदारी से कहते हुए एेसा समां बांधा कि सुनने वाले अपनी जगह से हिलना नहीं चाह रहे थे। निज़ामत अबरार काशिफ ने की।

By: Yagya Singh Thakur

Updated: 10 Feb 2020, 01:16 AM IST

रायपुर द्य रविवार की सर्द रात में रंगमंदिर में लफ्जों की गर्माहट का अहसास था। यहां देश के नामचीन शायर अपनी शायरी से सामायिनों के कानों में मिश्री घोल रहे थे। लोगों को पुरसकूं खुशी महसूस हो रही थी। यहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामरेड अकबर की स्मृति में फि़ल्म आर्ट कल्चर एंड थिएट्रिकल सोसायटी रायपुर द्वारा ब यादगारे कामरेड अकबर ऑल इंडिया मुशायरा आयोजित किया गया। शायरों ने अपने एक से बढ़कर एक कलाम पेश कर खूब वाहवाही बटोरी। एक-एक हर्फ वजनदारी से कहते हुए एेसा समां बांधा कि सुनने वाले अपनी जगह से हिलना नहीं चाह रहे थे। निज़ामत अबरार काशिफ ने की।
ये भारत देश अपनी शान है
हाकिमे वक्त के मंसूबों से डर लगता है
क्यों मुझे अपना ही घर गैर का लगता है
ये भारत देश अपनी शान है
इतना ही कहना है इसी पर जानो दिल कुर्बान है
इतना ही कहना है
हमारे ताज को अभी अजायबघर में रखे हैं हमारी बस यही पहचान है इतना ही कहना है।
-ताजवर सुल्ताना, प्रयागराज
शोर उठा है कि सैलाब है आने वाला
सबकी आवाज में आवाज मिलाने वाला
वक्त पडऩे पे नहीं साथ निभाने वाला
कश्तियां सारी मरम्मत को गईं हैं या रब
शोर उठा है कि सैलाब है आने वाला
समझ में उसकी ये बात आएगी कभी न कभी चढ़ी नदी तो उत्तर जाएगी कभी न कभी।
जमाना रोक के कब तक रखेगा सूरज को
हमारे घर में भी धूप आएगी कभी कभी
कश्तियां डूब रही हैं यहां एक एक करके
और हम खुश हैं कि पतवार संभाले हुए
हमने जब ऐतबार किया सर्द रात पर सूरज उदास हो गया इतनी सी बात पर
-अतुल अजनबी, ग्वालियर
बदन पर जख्म है कितने शुमार मत करना
हार जीत तो जंगों में होती रहती है
किसी निहत्थे सिपाही पर वार मत करना
बस इतनी देर में दुश्मन संभल भी सकता है
बदन पर जख्म है कितने शुमार मत करना
तमाम जिनके सफर के थक हुए पंछी
घरों को लौट रहे हैं शिकार मत करना
-महेंद्र सिंह अश्क, नजीबाबाद
सीखा है मैंने बोलना रायपुर में
लिखे हैं जिंदगी के वरख रायपुर के मुझको मिले कितने सबक रायपुर में
और आए नजर यहीं से जिया जो जहां मुझे सीखा है मैंने बोलना रायपुर में
क्या वतन छोड़के क्या हम अहले वफा जाएंगे हम इसी देश के हिस्सा कहां जाएंगे
मारना चाहते हो मार लो हमको मर के भी इसी धरती में समा जाएंगे
जिया जैदी, कानपुर

Yagya Singh Thakur
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