कोण्डागांव : पानी की कमी दूर करने पांच हजार कुएं का होगा निर्माण

- बेहतर जल प्रबंधन और उन्नत कृषि के तालमेल से ग्रामीण होंगे लाभान्वित, मत्स्योत्पादन को भी मिलेगा बढावा : कलेक्टर
- मनरेगा से जिंदगी बदलने की जुगत, पर्वतीय ग्राम कुएमारी में अब कुओं से बहेगी विकास की जलधारा

By: ramdayal sao

Published: 16 May 2020, 07:22 PM IST

raipur/ कोण्डागांव. ‘अगर हम टिकाउ विकास की बात करें तो इन पहाड़ी क्षेत्रों के मूल पहलुओं पर ध्यान देना होगा। इस पठारी क्षेत्र के निवासी निरंतर प्राकृतिक चुनौतियों से लड़ते हुए और न्यूनतम संसाधनों के बावजूद वर्षों से गुजर-बसर करते आ रहे है परन्तु अब प्रशासन यहां के समग्र विकास के लिए प्रतिबद्ध है।‘
जिला मुख्यालय से लगभग 72 कि.मी. दूरस्थ पर्वतीय गांव कुएंमारी (विकासखण्ड-केशकाल) पहुंचकर कलेक्टर नीलकंठ टीकाम ने ग्रामीणों के समक्ष उक्ताशय के विचार व्यक्त किए। अपने प्रेरणादायी संबोधन में ग्रामीणों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पेयजल समस्या से निपटने हेतु सर्वप्रथम प्राकृतिक जल स्त्रोतों को सहेजने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
उन्होंने बताया कि केशकाल की पहाडिय़ां दंडकारण्य के पठार की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी है जो की अपने मनमोहक घाटियों और सागौन के लिए वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। इन घाटियों से बारदा, भंवरडीह एवं दूध बड़ी नदियों का उद्गम होने के साथ इसमें चर्रे-मर्रे, मलाजकुडुम जैसे सुंदर जलप्रपात भी विद्यमान हैं। इन घाटियों के ऊपर कुएमारी, चेरबेड़ा, कुम्मुड़, मिरदे, भंडारपाल, माडग़ांव, उपरबेदी, बेड़मामारी, रावबेड़ा जैसे अनेक जनजातीय गॉव बसे हैं। इन गांवों में रहने वाले सदियों से मुख्यधारा से अलग वनों में अपना गुजर बसर करते हैं। इनके आय के लिये मुख्य रूप से मानसूनी कृषि पर निर्भर करते हैं लेकिन इन क्षेत्रों में बाक्साइड की प्रचुरता, पठारीय एवं असमतल भूमि की वजह से यहां पर वनोत्पादों का भी अभाव रहता है। ऐसे में ये क्षेत्र जिले के अत्यंत पिछड़े इलाकों में शामिल हो जाते हैं।

पेयजल की दिक्कत है प्रमुख समस्या
उन्होंने जानकारी दी कि इन क्षेत्र वर्षा ऋतु में तो जल की मात्रा पर्याप्त होती है। जिससे ये कृषि कार्य सकुशलता से कर लेते हैं परन्तु सर्दियां आते सारा जल पहाड़ों के ढालों में बने अवनालिकाओं के माध्यम से घाटियों की ढलान से होता हुआ नदियों में विसर्जित हो जाता है ऐसे में वह क्षेत्र जो वर्षा ऋतु में जल की प्रचुरता से आह्लादित होता है वह ग्रीष्म ऋतु आते जल के अभाव में तरसता नजर आता है। ग्रीष्म ऋतु आते तक सम्पूर्ण जल अवनालिकाओं के माध्यम से घाटियों के तराई में पहुँच जाता है। ये वक्त इन वनवासियों के लिए अत्यंत कष्टप्रद समय होता है जहां इनके आजीविका हेतु ना इनके पास कृषि होती हैं ना ही वनोत्पाद ऐसे में यहां के लोग पलायन करने को ही एक मात्र उपाय मान दूसरे शहरों में व्यवसाय तलाश में जाते हैं जहाँ उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

समस्या से निपटने के लिए 5 हजार कुओं के निर्माण का है लक्ष्य
कलेक्टर ने आगे कहा कि इस क्षेत्र मे लगातार दौर करने के पश्चात ग्रामीणों द्वारा यहां की समस्याओं से अवगत कराया जाता रहा है जिसे देखते हुए उन्होंने जनपद, तहसील एवं अन्य संबंधित अधिकारियों से संयुक्त टीम बना कर कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए। जिसके सर्वोत्तम विकल्प के रूप में कलेक्टर ने 5000 कुओं के माध्यम से जलसंकट निवारण करने का आदेश दिया। जिसके अंतर्गत वर्तमान में 112 कुओं के मार्किंग का कार्य पूर्ण हो गया है।
112 कुओं का मनरेगा द्वारा कार्य हुआ प्रारंभ
कुआं निर्माण के सम्बंध में केशकाल जनपद सीईओ एसएल नाग ने बताया कि जिला खनिज न्यास की निधि से ग्रामवासियों के हांथों मनरेगा द्वारा 5 हजार से अधिक कुओं का निर्माण किया जाना है। इसके लिए अभी 112 कुओं की मार्किंग पूर्ण कर इसमें खनन का कार्य चालू कर दिया गया है। इससे इन क्षेत्रों की पेयजल की समस्या दूर होने के साथ ग्रामीणों को रोजगार प्राप्ति भी होगी।

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