छत्तीसगढ़ में विक्रम उसेंडी खिलाएंगे कमल या भूपेश जारी रखेंगे विजय अभियान

भाजपा ने सांसद विक्रम उसेंडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर लोकसभा चुनाव के लिए आदिवासियों को साधने का प्रयास क्र रही है , वहीं कांग्रेस ओबीसी कार्ड पर ही टिके रहना चाहती है क्योंकि प्रदेश में आदिवासियों से ज्यादा ओबीसी वर्ग की आबादी है।

By: Deepak Sahu

Updated: 20 Apr 2019, 07:36 PM IST

रायपुर. छत्तीसगढ़ में अपनी सत्ता गंवाने के बाद भाजपा ने विक्रम उसेंडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है वहीं कांग्रेस को सत्ता पर काबिज करवाने वाले भूपेश बघेल ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष है। दोनों अध्यक्षों पर लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव है।भाजपा ने सांसद विक्रम उसेंडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर लोकसभा चुनाव के लिए आदिवासियों को साधने का प्रयास क्र रही है , वहीं कांग्रेस ओबीसी कार्ड पर ही टिके रहना चाहती है क्योंकि प्रदेश में आदिवासियों से ज्यादा ओबीसी वर्ग की आबादी है।

दूसरी तरफ, कांग्रेस का यह भी मानना है कि प्रदेश में सरकार बनने के बाद आदिवासियों को हर तरह से संतुष्ट किया गया है। मंत्रिमंडल में तीन आदिवासी मंत्री हैं। बस्तर और सरगुजा विकास प्राधिकरण के अलावा नए मध्य क्षेत्र विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष भी आदिवासी समाज से ही बनाया गया है।कांग्रेस ने विधनसभा चुनाव में मिली सफलता और ओबीसी वोटर्स को ध्यान में रखते हुए भूपेश बघेल को ही प्रदेश की कमान सँभालने की जिम्मेदारी दी है । उन्हें अध्यक्ष पद से नहीं हटाए जाने की बड़ी वजह ओबीसी वोट बैंक को साधना भी है।

विधानसभा चुनाव में जिस तरह से भाजपा को आदिवासी सीटों पर करारी हार मिली , उसे देखते हुए संगठन ने आदिवासी नेता को प्रदेश में पार्टी की कमान सौंपी है। बस्तर संभाग से भाजपा ने पहली बार आदिवासी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, ताकि उसे लोकसभा चुनाव में बस्तर संभाग की दो लोकसभा सीट बस्तर व कांकेर में सीधे फायदा हो।
संगठन का मानना है कि आदिवासी प्रदेश अध्यक्ष का प्रभाव आदिवासी बाहुल्य सरगुजा लोकसभा सीट पर भी पड़ेगा। इसके अलावा संगठन का यह भी मानना है कि बाकी आठ लोकसभा सीटों पर भी आदिवासी वोटरों का प्रभाव है। प्रदेश में आदिवासियों की आबादी लगभग 82 लाख है।

भाजपा अध्यक्ष पर दोहरा दबाव है। उन्हें विधानसभा चुनावों में मिली हार से पार्टी को उबारना भी है और 2014 में मिली जीत को भी दोहराना है ,कांग्रेस अध्यक्ष अपनी जीत से उत्साहित हैं और लोकसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं।अब आने वाला वक़्त बताएगा की ओबीसी और आदिवासी की लड़ाई में बाजी कौन मारेगा।

 

 

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