सालों से जीत के लिए तरस रही कांग्रेस क्या इस बार रायपुर को अपना बना पाएगी,पढ़िए

छत्तीसगढ़ की राजधानी की लोकसभा सीट पर इस बार कांटे की टक्कर देखने मिलेगी। रायपुर से जहां कांग्रेस ने सीटिंग मेयर प्रमोद दुबे को मुकाबले में उतारा है , वहीं भाजपा ने पूर्व मेयर सुनील सोनी पर दाव खेला है।

By: Deepak Sahu

Updated: 21 Apr 2019, 06:48 PM IST

रायपुर तीसरे चरण के चुनाव में छत्तीसगढ़ के रायपुर लोकसभा सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होना है।इस सीट से भाजपा कांग्रेस और बसपा के उम्मीदवार समेत कुल 25 लोगों ने अपना नामांकन कराया है लेकिन इसमें से बसपा प्रत्याशी ने पहले ही कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान नकार दिया है ऐसे में इस सीट से कुल 24 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी की लोकसभा सीट पर इस बार कांटे की टक्कर देखने मिलेगी। रायपुर से जहां कांग्रेस ने सीटिंग मेयर प्रमोद दुबे को मुकाबले में उतारा है , वहीं भाजपा ने पूर्व मेयर सुनील सोनी पर दाव खेला है। दोनों ने अपने कार्यकाल में अपनी छवी को बेहतर बनाया है। मुकाबला कड़ा है। दुबे सामान्य वर्ग से आते हैं, तो सोनी ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। रायपुर सीट के अंतर्गत 9 विधानसभा क्षेत्र आते है और इनमे से पांच विधानसभा सीटों पर ब्राम्हणो का कब्जा है जबकि कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की है।

रायपुर की पांच विधानसभाओं में सामान्य और ओबीसी वर्ग की आबादी करीब 82 फिसदी और चार में 75 प्रतिशत तक है।इस लिहाज से देखा जाय तो कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद दुबे का पलड़ा भारी दिखाई देता है।मेयर रहते हुए उन्होंने रायपुर में कई महत्वपूर्ण काम किये हैं साथ ही उन्हें राजनीतिकी मैनेजमेंट का भी अच्छा ज्ञान है। विधानसभा चुनाव के नतीजे भी उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

वहीं सुनील सोनी की लोगों के बीच छवी काफी अच्छी है। प्रमोद दुबे की तरह उन्होंने भी छात्र नेता बनने से अपने राजनीतिक करयिर की शुरुआत की थी। इसके अलावा पार्टी संगठन में प्रवक्ता और कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं साथ ही ओबीसी फैक्टर भी उनके पक्ष में काम कर सकता है।

छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से एक रायपुर सीट सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है।1952 से अब तक यहां कुल 16 लोकसभा चुनाव संपन्न हुए हैं। 1999 तक यह लोकसभा सीट मध्य प्रदेश के अंतर्गत आती थी। सन 2000 में मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद बने छत्तीसगढ़ के अंतर्गत आने के बाद यहां से तीन लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। 1952 और 1957 में निर्वाचन क्षेत्र के लिए दो सीटें थीं, इसलिए प्रथम और द्वितीय उम्मीदवार दोनों को विजेता घोषित किया गया था।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगी विद्या चरण शुक्ला ने इस निर्वाचन क्षेत्र से दो कार्यकाल जीते। बीजेपी के रमेश बैस पिछले बार के चुनावों में यहां से 7 बार जीत चुके हैं। उन्हें केवल 1991 में हार का मुंह देखना पड़ा था और 1996 से 2014 तक लगातार छह बार जीत दर्ज की है।


इस लोकसभा सीट पर 2014 में पुरुष मतदाताओं की संख्या 979,133 थी, जिनमें से 659,070 ने वोटिंग में भाग लिया. वहीं पंजीकृत 925,097 महिला वोटर्स में से 591,775 महिला वोटर्स ने भाग लिया था। इस तरह कुल 1,904,230 मतदाताओं में से कुल 1,250,845 ने चुनाव में अपनी हिस्सेदारी तय की. 2019 के सत्रहवें लोकसभा चुनाव में 1904460 से ज्यादा मतदाता अपने क्षेत्र के सांसद का चुनाव करेंगे।

 

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