scriptloot in private schools, increase fees 50 to 80 percent after covid | प्राइवेट स्कूलों में मची खुली लूट, कोरोना के बाद 50 से 80 फीसदी फीस बढ़ाई | Patrika News

प्राइवेट स्कूलों में मची खुली लूट, कोरोना के बाद 50 से 80 फीसदी फीस बढ़ाई

नर्सरी जैसी छोटी कक्षाओं में ही दो से ढाई हजार महीने की वसूली कर रहे स्कूल संचालक। नर्सरी जैसी छोटी कक्षा का सालाना खर्च 50 हजार से ज्यादा। मोटी फीस वसूलकर शिक्षकों का भी भला नहीं करते। राज्य स्तर पर भी सुनवाई के लिए अब तक कोई मंच नहीं, प्रशासन नहीं दे रहा ध्यान।

रायपुर

Published: July 08, 2022 02:51:26 pm

जगदलपुर। जिले के प्राइवेट स्कूलों में खुली लूट मची हुई है। हर स्कूल में पालकों की जेब काटने का खेल चल रहा है। शहर के बड़े से लेकर मध्यम स्तर तक के स्कूल में औसतन दो से ढाई हजार रुपए फीस के रूप में वसूले जा रहे हैं। यह फीस नर्सरी जैसी छोटी कक्षाओं की है। 12वीं तक यही मंथली फीस 5 से छह हजार रुपए तक पहुंच रही है। जानकार बताते हैं कि कोरोना से पहले स्कूलों में इतनी फीस नहीं थी।

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नर्सरी से एलकेजी और यूकेजी तक की कक्षाओं में हजार से बारह सौ रुपए तक लिए जा रहे थे लेकिन कोरोना की स्थिति सामान्य होने के बाद जब इस साल स्कूल पूरी तरह से खुले तो स्कूल संचालकों ने फीस में भारी बढ़ोतरी कर दी। एक अनुमान के अनुसार 50 से 80 फीसदी तक फीस में बढ़ोतरी की गई है। कई स्कूलों में तो 100 प्रतिशत फीस बढ़ा दी गई है। बड़े स्कूल में बच्चों की पढ़ाई का अरमान रखने वाले माता-पिता मजबूरीवश अपने बच्चों को पढ़ाने को मजबूर हैं। शहर के एक पुराने और प्रतिष्ठित इंग्लिश मीडियम स्कूल के एक पालक ने बताया कि वे मध्यमवर्गीय परिवार के अंतर्गत आते हैं।

उनके पास बीपीएल कार्ड नहीं है लेकिन बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने की चाह है इसलिए महंगे स्कूल में दाखिला करवाने की मजबूरी है। परिवार के दूसरे खर्चों में कमी करके बच्चों की फीस भर रहे हैं। शहर के प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूलों की मनमानी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार पालक इस बात का विरोध कर चुके हैं लेकिन वे फीस बढ़ाने से बाज नहीं आ रहे हैं। शिक्षा विभाग में कई बार छात्र संगठनों और पालकों ने शिकायत भी की है इसके बावजूद फीस में कोई कमी नहीं हो रही है ।

प्रशासन की सख्ती हो तभी संभल सकते हैं हालात-
फीस बढ़ोतरी के मामले में अक्सर शिक्षा विभाग और प्रशासन तक शिकायत पहुंचती है लेकिन प्रशासन या शिक्षा विभाग की ओर से स्कूल के लिए कोई सख्ती कभी नजर नहीं आती। इस बात का स्कूल प्रबंधन फायदा उठाते हैं और खुलेआम पालकों को लुटते हैं। प्रशासन अगर इस मामले में सख्त हो जाए तो हालत थोड़े काबू में आ सकते हैं। स्कूल प्रबंधन की मनमानी को लगातार नजरअंदाज किया जाता है। जिले से लेकर राज्य तक कोई ऐसा मंच नहीं है जहां पालकों की सुनवाई हो।

राज्य में नेताओं और नौकरशाहों के शैक्षणिक संस्थान इसलिए नियामक आयोग ठंडे बस्ते में-
प्रदेश में भाजपा की पिछली सरकार के वक्त स्कूलों और कॉलेजों की फीस पर नियमन के लिए एक नियामक आयोग बनना था। कैबिनेट में इसे मंजूरी भी दे दी गई थी लेकिन उस वक्त कुछ प्रभावशाली नेताओं और नौकरशाहों ने सरकार के फैसले को रुकवा दिया। नियामक आयोग का मामला ठंडे बस्ते में चला गया। तब कांग्रेस में विपक्ष में थी और उसने इसका विरोध किया था लेकिन अब जबकि पिछले साढ़े तीन साल से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है तब भी नियामक आयोग की पुरानी फाइल को देखने की मौजूदा सरकार ने जहमत नहीं उठाई है। नियामक आयोग नहीं होने की वजह से ही स्कूलों की मनमानी जारी है। अगर प्रदेश में नियामक आयोग होता तो इतनी फीस नहीं बढ़ती। ंदेश में उत्तरप्रदेश, हिमाचल, दिल्ली समेत कई राज्य हैं जहां नियामक आयोग काम कर रहा है और वहां हर साल सरकार ही तय करती है कि कितनी फीस बढऩी चाहिए।

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