बस्तरियों का विश्वास जीतें

बस्तरिया बटालियन के फील्ड में उतरने में लेटलतीफी

By: Gulal Verma

Published: 24 Jul 2018, 07:07 PM IST

माओवादियों से निपटने के लिए गठित की गई बस्तरिया बटालियन के फील्ड में उतरने में लेटलतीफी चिंतनीय है। जब बटालियन शुरू करने के लिए एक हजार के करीब पदों पर भर्ती की जानी है, तो इसके लिए गंभीर व त्वरित कवायद की जानी चाहिए। माओवाद प्रभावित बस्तर में विगत कुछ महीनों से सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिल रही है। सुरक्षा बलों की कामयाबी से जहां शासन-प्रशासन में माओवाद खत्म होने की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी ओर बौखलाए माओवादी सड़कें खोदकर, पेड़ काटकर, यातायात अवरुद्ध कर सुरक्षा बलों और बस्तरवासियों के सामने कई तरह की मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि माओवादी प्रदेश के लिए नासूर बन गए हैं। माओवाद प्रभावित क्षेत्र के लोगों का जीना दूभर हो गया है। मुखबिरी के शक में माओवादी आम आदिवासियों को मौत के घाट उतार देते हैं। शासकीय भवनों, पुल-पुलियों को ढहा देते हैं। सड़कें खोद देते हैं। रेल पटरी उखाड़ देते हैं। जवानों का अपहरण कर मार डालते हैं। जनप्रतिनिधियों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। कहीं भी, कभी भी वारदात को अंजाम देकर आसानी से भाग जाते हैं। ऐसे में माओवादियों से लोहा लेने में सुरक्षा बलों का हाथ मजबूत करने, उन्हें मदद करने के लिए गठित 'बस्तरिया बटालियनÓ को शीघ्र ही फील्ड में उतारने की आवश्यकता है।
माओवादियों की करतूतों पर नजर डाली जाए तो सहज ही पता चल जाएगा कि भोले-भाले, सीधे-सादे आदिवासियों के हाथों में अत्याधुनिक हथियार थमा कर उन्हें पुलिस व सुरक्षाबलों पर हमला करने की ट्रेनिंग दी जाती है। माओवादियों के चंगुल में फंसे आदिवासी युवक-युवतियां वारदात को अंजाम देते हैं। आदिवासियों के हितैषी होने का दंभ भरने वाले माओवादी मासूम बच्चों तक के हाथों में हथियार थमाने से गुरेज नहीं करते। यह तो कुछ उदाहरण मात्र है, लेकिन हकीकत इससे भयावह है। इन हालात में बस्तरिया बटालियन के गठन से न केवल अनुसूचित जनजाति के युवक-युवतियों को नौकरी मिलेगी, बल्कि सरकार को माओवाद क्षेत्र में स्थानीय आरक्षकों की पदस्थापना में होने वाली दिक्कतों से छुटकारा भी मिलेगा। स्थानीय सिपाहियों की कमी दूर होगी। युवा वर्ग माओवादियों के चंगुल में फंसने से बचेंगे, सो अलग।
बस्तर में यदि सरकार बुनियादी सुविधाएं, यातायात सेवाएं, रोजगार मुहैया करा दे, आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन का मालिकाना हक दिला दे, उनके जीवन में उजियारा बिखेर दे, उनमें सुरक्षा का विश्वास बढ़ा दे तो माओवादियों को न कहीं पनाह मिलेगी और न ही कोई मददगार मिलेगा। माओवाद का समाधान ऐसे ही कई तरह के प्रयासों से ही निकलेगा।

Gulal Verma Desk
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