बड़ा खुलासा: मेडिकल सीट हथियाने मुन्ना भाई बन गए 3-3 राज्यों के मूल निवासी

स्पष्ट है कि यह पूरा खेल मेडिकल सीट हासिल करने का है। इस पर संचालनालय की दलील है कि उनके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं है जिससे यह पता लगाया जा सके कि अभ्यर्थी कितने राज्यों का मूल निवासी प्रमाण-पत्र रखता है। जानकारों का मानना है कि यह पल्ला झाडऩे जैसी स्थिति है।

By: Karunakant Chaubey

Published: 20 Nov 2020, 07:53 PM IST

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एमबीबीएस-बीडीसी सीट पर फस्र्ट राउंड काउंसिलिंग शुरू हो चुकी है। इस दौरान चिकित्सा शिक्षा संचालनालय ने जो मेरिट सूची जारी की है, उसमें 1 से लेकर 1000वीं रैंक तक के अभ्यर्थियों में से 14 के पास 2 से 3 राज्यों के मूल निवास प्रमाण-पत्र होने का बड़ा खुलासा हुआ है।

स्पष्ट है कि यह पूरा खेल मेडिकल सीट हासिल करने का है। इस पर संचालनालय की दलील है कि उनके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं है जिससे यह पता लगाया जा सके कि अभ्यर्थी कितने राज्यों का मूल निवासी प्रमाण-पत्र रखता है। जानकारों का मानना है कि यह पल्ला झाडऩे जैसी स्थिति है।

'पत्रिका' के पास 14 अभ्यर्थियों के अलावा 72 और नाम हैं। इनके पास मध्यप्रदेश का मूल-निवासी प्रमाण-पत्र है। जिसे मध्यप्रदेश ऑनलाइन सलेक्शन सिस्टम ने रिजेक्ट कर दिया। 1000 में 14 अभ्यर्थी और पहली मेरिट सूची में 4 हजार अभ्यर्थियों के नाम हैं। न जाने इनमें कितने 2-2, 3-3 मूल-निवासी प्रमाण-पत्र वाले अभ्यर्थी होंगे।

ऐसे लेते हैं फायदा

दो-दो, तीन-तीन मूल-निवासी प्रमाणपत्र के जरिए अभ्यर्थी हर इन राज्यों की काउंसिलिंग में शामिल होते हैं। सीट अलॉटमेंट करवा लेते हैं। इसके बाद जहां इन्हें सुविधाजनक लगता है, वहां दाखिला लेते हैं। तब तक बाकी राज्यों की सीट इंगेज रहती हैं। इसका नुकसान एक मूल-निवासी वाले योग्य अभ्यर्थी को होता है। जबकि राज्य कोटा सीट पर सिर्फ राज्य के अभ्यर्थियों का ही अधिकार होता है।

इन राज्यों के मूल-निवासी

अधिकांश के पास छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के मूल-निवासी प्रमाणपत्र भी मिले हैं।

क्या कहता है नियम

राज्य कोटे से एमबीबीएस-बीडीएस पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए राज्य का मूल निवासी होना अनिवार्य है। निजी कॉलेजों की मैनेजमेंट कोटा सीट के लिए यह अनिवार्यता नहीं है। राजस्व विभाग के नियम में स्पष्ट है कि भारत में रहने वाले एक व्यक्ति का एक ही राज्य का मूल निवास प्रमाण-पत्र बन सकता है।

2013 और 2017 में भी हुआ था ऐसा ही खुलासा

2013 और 2017 में नीट क्वालीफाई करने वाले कई अभ्यर्थियों ने एक से अधिक बल्कि कई ने 3-3, 4-4 मूल निवास प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल एमबीबीएस सीट हथियाने के लिए किया था। 2013 में 15-20 छात्रों का दाखिला भी हो गया था, बाद में मेरिट रद्द कर नई मेरिट जारी की गई थी। साथ ही तत्कालीन राज्यपाल बलरामजी दास टंडन के निर्देश पर छात्रों से शपथपत्र लिया जाने लगा कि अगर मूल निवासी में गड़बड़ी पाई जाती है तो दाखिला रद्द होगा।

छत्तीसगढ़ में अभ्यर्थियों द्वारा ऑनलाइन आवेदन के समय और प्रवेश के समय दिए जा रहे भी मूल निवासी प्रमाणपत्रों की जांच ही नहीं होती है। इससे छत्तीसगढ़ के बच्चों का बड़ा नुकसान होगा।

- डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, चिकित्सा प्रकोष्ठ, प्रदेश कांग्रेस कमेटी

जो भी शिकायतें होती हैं, वे अपुष्ट होती हैं। मूल निवासी का सत्यापन करवाया जाएगा। कोई गड़बड़ी पाई जाएगी, तो दाखिला रद्द करने का प्रावधान है। मगर, अभी अभ्यर्थी को दाखिले से वंचित नहीं कर सकते।

- डॉ. आर.के. सिंह, संचालक, चिकित्सा शिक्षा संचालनालय

Karunakant Chaubey Desk/Reporting
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