ध्यान रखें! राजधानी के प्राइवेट स्कूलों में भी सुरक्षित नहीं हैं आपके बच्चे, ये हैं कमियां

शहर में आपराधिक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लेकिन सरकारी और निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।

By: अभिषेक जैन

Published: 11 Sep 2017, 03:00 PM IST

रायपुर. शहर में आपराधिक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लेकिन सरकारी और निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। हाल ही में गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में बच्चे की हत्या की घटना के बाद पत्रिका ने शहर के प्रमुख स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। लेकिन हर जगह सुरक्षा में लापरवाही नजर आई।


पता चला कि घर की दहलीज से बाहर कदम रखते ही मासूमों की जिंदगी दांव पर लग जाती है। जिले के साढ़े तीन हजार स्कूलों में पांच लाख बच्चे पढ़ते हैं। मोटी फीस वसूलने के बावजदू निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है। सरकारी स्कूलों की स्थिति तो और भी खराब है। यहां सीसीटीवी तो दूर बाउंड्रीवाल तक नहीं है। गेट पर सुरक्षा गार्ड नहीं, बस कंडक्टर के बारे में पुलिस थाना, आरटीओ और शिक्षा विभाग के पास कोई रिकार्ड तक नहीं है।

किसी भी सरकारी स्कूल में सुरक्षाकर्मी नहीं, निजी में भी यही हाल
पत्रिका की टीम नलघर चौक के पास स्थित राजधानी के सबसे पुराने सरकारी स्कूल की पड़ताल की तो यहां पर सुरक्षा के कोई भी इंतजाम नहीं देखने को मिला। सुरक्षा के नाम पर यहां न तो सीसीटीवी कैमरा लगा है और न ही सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। इसी तरह संतोषी नगर स्थित चारदीवारी रहित शासकीय स्कूल परिसर रात में शराबियो का अड्डा बना नजर आया। गुढि़यारी के कृष्णानगर में एक निजी स्कूल में पढऩे वाले तकरीबन 1600 बच्चों की सुरक्षा के लिए न तो सीसीटीवी लगाया गया है और न ही सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। इसी तरह पंडरी स्थित निजी स्कूल में पढऩे वाले लगभग तीन हजार छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक सुरक्षाकर्मी तैनात है।

सिर्फ बसों के बाहर लिख दिया जीपीएस लैस

पत्रिका की पड़ताल में कई निजी स्कूलों व बसों में लगाया गया सीसीटीवी कैमरा व जीपीएस सिस्टम बंद मिला। बस की दीवार पर यह जरूर लिख दिया गया है कि यह बस सीसीटीवी की निगरानी में है। स्कूल संचालक आरटीओ की कार्रवाई से बचने के लिए यह खानापूर्ति करते हैं। छात्र-छात्राओं के कॉमन बसों में एक महिला अटेंडेंट होना अनिवार्य है, लेकिन किसी भी बस में अटेंडेंट देखने को नहीं मिली।

सीसीटीवी कैमरे की मॉनिटरिंग के लिए स्टाफ ही नहीं

शहर के नामी गिरामी कुछ निजी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे जरूर लगाए गए हैं। लेकिन इनकी मॉनिटरिंग के लिए स्टाफ ही नहीं है। प्राचार्यों ने निगरानी का सेटअप अपने कमरे में लगा रखा है। लेकिन वे नियमित रूप से इस पर नजर नहीं रख पाते। एेसे में इसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है।

&जिला शिक्षाधिकारी को निजी और सरकारी स्कूलों की सुरक्षा के संबंध में जांच के निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही इसके लिए टीम बनाकर जांच शुरू कराई जाएगी।
ओपी चौधरी, कलक्टर रायपुर

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

-बसों में फायर फाइटर सिस्टम
-प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स
-बस की सीटों के नीचे स्कूली बैग सुरक्षित रखने के लिए किट
-खिड़कियों में ग्रिल, गेट में लॉक होने चाहिए।
-स्कूली बसों के टायर बेहतर होने चाहिए।
-सीसीटीवी व जीपीएस सिस्टम होना चाहिए।
-बसों में स्पीड गर्वनर लगे होना चाहिए। प्रशासन की जांच में मिली कमियां
-साल में एक बार स्कूली ड्राइवरों की जांच की जाती है। इस दौरान कई बसों के चालक व कंडक्टर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित पाए जाते हैं। किसी को शुगर तो किसी का बीपी की समस्या रहती है। कुछ ड्राइवरों की नजर कमजोर मिलीं।

मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं

शिक्षा विभाग के पास स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था की मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं है। स्कूल संचालक अभिभावकों से कॉपी-किताब, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाओं के नाम पर मनचाही फीस वसूल रहे हैं।

कमरे में बैठक लेकर सिर्फ हिदायत

जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की ओर से साल में एक दो बार निजी स्कूलों के प्राचार्यों के साथ बैठक कर उन्हें सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में हिदायत दी जाती है। लेकिन हिदायत के अनुपालन की जांच नहीं की जाती।

&निजी स्कूलों में तो सिर्फ व्यापार किया जा रहा है। बिना पुलिस वेरीफिकेशन के स्टॉफ रखे जा रहे हैं। टीचरों द्वारा बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त करने के दर्जनों मामले हैं। एेसे में अध्यापकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण होना जरूरी है। अभिभावकों को भी एक्टिव होना होगा।
एचए रिजवी, अध्यक्ष, पालक संघ

 

 

 

अभिषेक जैन
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