scriptpuri ke jgannath mandir h duniya bhar m prasiddha he | भगवान जगन्नाथ स्वामी के ‘हाथ’ के महिमा | Patrika News

भगवान जगन्नाथ स्वामी के ‘हाथ’ के महिमा

भगवान कहिस- राजा के सरी बढ़ोतरी परजामन के उप्पर निरभर करथे। तैं परजामन ले मोला दूरिहा कर दे हस। वोमन ल मोर ले मिला। मोर दरसन करवा, तब कुछ बात बनही। तोर राज म मेहनत करइया मनखे के कमी हे। इहां के मन अउ कोनो मोर नाव लेवइया नइये। तेकर सेती तोर राज के दुरदसा हे। राजा समझ गे। परजामन ल सकेल के समझा डारिस। रथ यातरा सुरू होगे हरेक बछर।

रायपुर

Published: June 27, 2022 04:43:34 pm

भगवान के लास ह बोहावत-बोहावत ओडिसा पहुंच गे? उहां के राजा ल सपना दिस। अपन देस राज के नेम धरम अनुसार भगवान के लास के आखिरी बिधि-बिधान ल पूरा करिस। भगवान के इच्छा ले मंदिर बनाय बर विस्वकरमा खुद अइस। महीनाभर म मूरति बनाय के करार होगिस। बिन बिंधना-बसुला, आरी के काय काम करत होही? रानी के मन म संका उपजगे। कतको बरजिस राजा। रानी नइ मानिस। करार के पहिली कपाट हेर दे गिस। कपाट खुलतेच बढ़ईमन गायब। सुग्घर-सुग्घर तीन ठिन बिन हाथ-गोड़ के मूरति तियार।
राजा सोचिस अइसन मूरति ल नइ पधारना हे। नावा बनवाय के सोचिस। फेर, सपना आइस वोला। नावा झन बनवा इही मूरति म मेहा आवत हंव। ऐकरे परान-परतिस्ठा करवा। परान-परतिस्ठा के तियारी करावत कतको झिन बढ़ई करा हाथ-गोड़ बना के लगवाय के कोसिस करिस। कोनो हाथ-गोड़ फिट नइ बइठे। भगवान राजा ल सपना म फेर कहिस- तैं काबर कोसिस करत हस। पाछू जनम के भुगतना ल भुगते बर मोला इही रूप म बइठे के नेम के पालन करे बर हे।
राजा परान-परतिस्ठा करवा तो दिस, फेर कोनो ल बलइस नइ। कोनो परजा वोकर दरसन नइ कर सकय। वोला लागे कोनो हांसे झन। राजा के भगवान कइसे बिगन गोड़-हाथ के पधारे हे। एक दिन राजा ह भगवान ल सिकायत करिस। तेहा कहे रेहे मय तोर राज म आके बइठहूं तहांले तोर राज के बड़ बनौकी बनही। तोर राज के बिस्तार हो जही। फेर, मोला लागथे अइसन काहिंच नइ होवत हे। अतका दिन नहाक गे। मोर हाथ म जगत के नाथ आगिस तभो ले मेहा उहीच कर ले एक पांव नइ खसके हंव।
भगवान कहिस- राजा के सरी बढ़ोतरी परजामन के उप्पर निरभर करथे। तैं परजामन ले मोला दूरिहा कर दे हस। वोमन ल मोर ले मिला। मोर दरसन करवा, तब कुछ बात बनही। तोर राज म मेहनत करइया मनखे के कमी हे। इहां के मन अउ कोनो मोर नाव लेवइया नइये। तेकर सेती तोर राज के दुरदसा हे। राजा समझ गे। परजामन ल सकेल के समझा डारिस। रथ यातरा सुरू होगे हरेक बछर। तभु ले अभु तक चलत हे परंपरा रथ यातरा के। वास्तव म अइसे मनखे जेकर ले कोनो उम्मीद नइ रहय वोहा ‘अपन हाथ जगन्नाथ कहिके’ सरी बूता ल अकेल्ला निपटा डरत हे।
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पुरी के बिस्व परसिद्ध रथयातरा
हमर भारत देस के ओडिसा राज के पुरी म जगन्नाथजी के मंदिर ह दुनियाभर म परसिद्ध हे। ये मंदिर हिंदू धरम के चारों धाम के तीरथ म एक हे। हिंदू धरम म कहे जाथे के मरे के पहिली चारों धाम के यातरा करे बर चाही। जेकर से मोछ मिलथे।
पुरी के रथयातरा ह हिंदूमन के परसिद्ध तिहार म एक हे। इहां भगवान बिसनु के अवतार सिरी किसन के मंदिर हे। जेहा बहुत बिसाल अउ कई सौ बछर जुन्ना मंदिर हे। ये मंदिर ल देखे अउ भगवान जगन्नाथ के दरसन बर बछरभर लाखों भगतमन इहां आथें। पुरी ह भगतमन के आस्था के जगा हे। रथयातरा पुरी के संगे-संग देसभर म निकाले जाथे। छत्तीसगढ़ राज म घलो भगवान जगन्नाथजी के रथयातरा निकाले के परंपरा हाबय। जांजगीर चांपा जिला के अकलतरा ब्लाक के नरियरा गांव म बिसाल भगवान जगन्नाथ के रथयातरा निकाले जाथे। लइकामन घलो बड़ उछाह से भगवान जगन्नाथजी के रथयातरा निकालथें।
रथयातरा म सबसे पहिली ताल ध्वज रथ म सिरी बलरामजी, वोकर पीछू पद्म ध्वज रथ म बहिनी सुभदरा, अउ वोकर पीछू आखिरी म गरुन ध्वज रथ या नंदीघोस नांव के रथ म भगवान जगन्नाथ सबले पाछू चलथे। कहे जाथे के रथयातरा म सहयोग करे म मोछमिलथे। तेकरे बर भगतमन ए तीनों रथ के रस्सा ल खींचे बर उमड़ परथें।
भगवान जगन्नाथजी के रथयातरा ह बछर असाड़ सुक्ल पछ के दूतीया के निकाले जाथे। छत्तीसगढ़ म रथयातरा के दिन ल रजुतिया के नांव ले जानथंन। हिंदू संस्करीति म चारठन स्वयंसिद्ध लगन होथे। जेमा बिहाव बर कोनो लगन देखे के जरूरत नइ परय। रथयातरा ह चारों दिन म ले एक हाबय। ये तिहार ह आपसी भाईचारा के संदेस देथे। रथयातरा के सांस्करीतिक अउ पउरानिक दूनों के महत्तम हे।
भगवान जगन्नाथ स्वामी के ‘हाथ’ के महिमा
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