"भागा रे भाई भागा...अपन जान बचावा... लंबोदर गुस्सा गईल रे"

यदि जंगल उजडऩे से गुस्साए हाथी और इनसान के बीच टसल को रोकने का हुनर जानना है तो आपको सरगुजा संभाग में प्रतापपुर के जंगलों में श्रीराम कुशवाहा के साथ चलना होगा

By: चंदू निर्मलकर

Published: 17 Sep 2015, 10:45 AM IST

रायपुर. यदि जंगल उजडऩे से गुस्साए हाथी और इनसान के बीच टसल को रोकने का हुनर जानना है तो आपको सरगुजा संभाग में प्रतापपुर के जंगलों में श्रीराम कुशवाहा के साथ चलना होगा। यहां हाथियों के गुस्से का भी पता चलेगा कि उनका घर क्यों उजाड़ा जा रहा है। उधर ग्रामीणों की घबराहट भी देखने को मिलेगी। इसमें श्रीराम कुशवाहा हाथियों की भाषा में संवाद करते हैं और उनकी यह कला इनसान और हाथियों को आमने-सामने आने से रोकती है। जंगल में जैसे ही हाथियों की दहशत जागती है, तब श्रीराम सरई के पत्तों को मुंह में दबाकर एक खास तरह की आवाज निकालते हैं और बोलते हैं, भागा रे भाई भागा...अपन जान बचावा... लंबोदर गुस्सा गईल रे। भाई..पर काहे गुस्सा गईल..जरा बताअव तव। जरा समझावव तव।

प्रदेश में कटघोरा, कोरबा और धर्मजयगढ़ के जंगलों में 200 से ज्यादा हाथी हैं। सबसे ज्यादा 32 हाथी प्रतापपुर रेंज में हैं। लेकिन, कुछ सालों से इन जंगलों में हाथी और इनसान की लड़ाई में दोनों की ही जानें जा रही हैं। ऐसे में शांतिदूत के रूप काम कर रहे श्रीराम का नामकरण ग्रामीणों की जुबान पर प्रभु श्रीराम हो गया है। हालांकि वो मुस्कुरा कर कहते हैं, भगवान तो लंबोदर हैं, जो गांव वालों से खफा हैं। मैं भगवान और इंसान की लड़ाई को खत्म करना चाहता हूं।

ताकि मुझे अफसोस नहीं रहे
श्रीराम की खासियत को देखते हुए वन विभाग ने वर्ष 2005 में अपनी प्रबंधन टीम का हिस्सा बनाया, लेकिन हाल के दिनों में उन्हें सेवा से हटा दिया गया। प्रतापपुर रेंज के प्रभारी अनिल सिंह कहते हैं, कुशवाहा का कामकाज सबसे बेहतर था, लेकिन वेतन देने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए उन्हें हटाना पड़ा। हालांकि इसके बाद श्रीराम की माली हालत खराब हो गई, लेकिन उन्होंने हाथी और इनसानों के बीच दोस्ती का रिश्ता रखने की मुहिम में कोई कसर नहीं छोड़ी है।  श्रीराम कहते हैं, इस बात का अफसोस न रहे कि मैं ग्रामीण और हाथी को लडऩे से नहीं रोक पाया।

बच्चों की पुकार

हाथियों को खदेडऩे या उन्हें बुलाने के लिए सरई के पत्तों का ही इस्तेमाल क्यों? पूछने पर श्रीराम बताते हैं, हाथियों को सरई वन पसंद है। इनके पत्तों में कोमलता और कठोरता दोनों होती है। इसे मुंह में दबाकर खास तरह की आवाज निकलती है, जो हाथियों के बच्चों जैसी होती है। चूंकि हाथी एक संवेदनशील प्राणी होता है और उसका अपने बच्चों से खास लगाव होता है, जिसकी वजह से वे इस आवाज को नजरअंदाज नहीं करते हैं और जंगल की तरफ चले जाते हैं।
-प्रतापपुर से राजकुमार सोनी
Show More
चंदू निर्मलकर Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned