अंग्रेज चतुर थे, उन्होंने भारत की संकृति को दिशाहीन किया : शंकराचार्य

Chandu Nirmalkar

Publish: Jul, 13 2018 08:37:21 PM (IST)

Raipur, Chhattisgarh, India

जितनी व्यास पीठें मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में उपेक्षित नहीं रहीं, उतनी आजाद भारत में हैं। हैदराबाद के नवाब ने तो शंकारचार्यों के शाही स्वागत तक का आदेश दिया था। अंग्रेज कुटिल थे, लेकिन उन्होंने भी व्यास पीठ व्यवस्था को नहीं छेड़ा, क्योंकि ऐसी असली-नकली व्यवस्था की बात करते, तो फिर उनके पादरी, इमामों का क्या होता। वे भी इस दायरे में आते। पोप धर्मगुरु नहीं हैं, वे वेटिकन के राजा भी हैं राष्ट्राध्यक्ष भी। दलाई लामा भी बौद्धों में एक उदाहरण हैं। दुनिया के 204 मुल्कों की राज्य व्यवस्था को उठाकर देखिए, कहीं बाइबिल से तो कहीं कुरान से व्यवस्था चल रही है। जब वहां ऐसा हो सकता है, तो भारत में क्यों नहीं? हम महाभारत, वाल्मीकि रामायण या मनु स्मृति से व्यवस्था संचालित कर सकते हैं।

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