नदावत तरिया संस्करीति ह कइसे बांचही?

तरिया ल पाटे ले रोके बर परही

By: Gulal Verma

Published: 25 Apr 2018, 06:40 PM IST

रायपुर। पुरातन समे ले गांव-सहरमन तरिया-नदिया के तीर-तीर म बसे हावय। पहिली तो खेत-खार के बीच-बीच म अड़बड़ तरिया-डबरी राहय। जेकर ले किसानमन अपन खेत म पानी पलो के फसल ल पको लेवंय। गांव के तीर तरिया म घाट बने राहय। पहिली गांवमन म नल-जल के बेवस्था नइ रिहिस तब तरिया म सबके निस्तारी होवय। पानी भरे के बेरा म माइलोगनमन मेल-पिलाप हो जाय। वइसने बिहनिया नहाय के बेरा म गांवभर मनखे एक-दूसर ले गोठ-बात करके अपन सुख-दुख ल बांटय।
तरिया के धारमिक महत्तम घलो अड़बड़ हे। जंवारा, भोजली, गनपति, दुरगा ल तरियाच म सरोथे। कमरछठ के 'सगरीÓ तरिया के छोटे रूप आय।
फेर तरिया ल पाट के घर बनावत जावत हें। खेत-खार के तरियामन म कब्जा करत जावत हें। अपन घर के गंदगी ल तरिया म फेंक देथें। गरीब मनखे जेकर घर नल-जल के बेवस्था नइये उंकर निस्तारी तो तरियाच आय। गाय-गरू, चिरई-चिरगुन के आसरय घलो तरिया ए। पहिली के मनखेमन तरिया-डबरी खोदवाके पुन के काम करंय। आवव हमन सब तरिया के पार म अमरइया लगाके, कोइली के मधुर कंठ ले मीठ-मीठ गाना सुनन।
जेन गांव म जतेक जादा तरिया हे वोला वोतके जादा पुन वाला गांव माने जाथे। काबर के तरिया बनवई ल पुन के काम माने जाथे। वोकरे सेती गौंटियामन तरिया खोदवांय। तरिया ल पटइया पापी कहांय। अब सुवारथ के सेती तरिया कमतियावत हे। थोरकुन लाभ के चक्कर्र म तरियामन ल पाटत जावत हें। तरिया ले हमर परंपरा अउ संस्करीति जुड़े हे।
हर सु- दुख म तरिया हमर साथी होथे। लइका के जनम होय या फेर मनखे के मरनी, तरिया जाय म ही सुद्ध होथन। अपन परंपरा-संस्करीति ल बचाय बर हे त तरिया ल बचाय बर परही।
तरिया ल देवता माने गे हे। तरिया तीर घर के माइलोगमन बेटा जूतिया मनाथें। कमरछट म तरिया के पूजा करे जाथे। तरिया मनखे बर बरदान आय। अब बरदान ल सराप म बदलत हे। कमतियात तरिया के जिम्मेदार हमन सबमन हन। प्लास्टिक, पखरा, कांच, पन्नी ह पानी म घुरय नइ अउ हमन ऐला तरिया म फेंकथन। तरिया के पानी के उपयोग ले पानी के बचत होथे। बेरा रहत तरिया के संरक्छन बर आघू नइ आयेन त वो दिन दूरिहा नइ हे जब तरिया फोटो भर म मिलही।

Gulal Verma Desk
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