खस्ताहाल स्थिति में गांव का गोठान शौचालय का दरवाजा भी गायब

गोठान बने सालभर हो चुका है। गोठान परिसर में ही 12 हजार रुपए की लागत से बना शौचालय खराब हालत में है। दरवाजा टूटा पड़ा हुआ है। देखरेख के अभाव ने सरकारी की यह योजना धरातल पर उतरने के पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है।

By: ashok trivedi

Published: 12 May 2020, 11:24 PM IST

गरियाबंद. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी योजना के तहत गांवों में बनाए गए गोठानों की हालत खराब है। न तो वहां मवेशियों को रखा जा रहा है और न ही गोबर से कंपोस्ट खाद बनाने का काम हो रहा है। नतीजा देखरेख के अभाव में गोठानों की हालत और खराब होती जा रही है। ग्राम पंचायत आमदी (द) में बने गोठान में मवेशियों के खाने के लिए बनाए गए कोटना में कचरा-कूड़ा भरा पड़ा है।
पानी की व्यवस्था के लिए जो बोर खोदे गए थे, वे भी अभी तक चालू नहीं किए गए हैं। जबकि गोठान बने सालभर हो चुका है। गोठान परिसर में ही 12 हजार रुपए की लागत से बना शौचालय खराब हालत में है। दरवाजा टूटा पड़ा हुआ है। देखरेख के अभाव ने सरकारी की यह योजना धरातल पर उतरने के पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है। ग्राम पंचायत सचिव बलराम पटेल ने बताया कि मैं अभी-अभी यहां आया हूं। अभी इस बारे में ज्यादा नहीं जाता।
बहुत जल्दी ग्राम समिति की टीम गठित की जाएगी। ऐसा ही कहना ग्राम पंचायत सरपंच का था। उन्होंने बताया कि मुजे अभी किसी प्रकार की पूरी जानकारी नहीं मिली है। केवल सिलेबस मिला है। यहां क्या-क्या हिसाब-किताब है मुझे इस बारे में नहीं बताए। जनपद जाकर पता करूंगी, तभी कुछ बोल पाउंगी।
अब कोई मवेशी गोठान में नहीं
पंचायत चुनाव हुए चार माह से अधिक हो गया और योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं होने की वजह से और जिम्मेदारों की चुप्पी से गोठान योजना सफल होते नहीं दिख रही है। गोठान बनने के बाद कुछ दिन ही वहां मवेशियों को रखा जाता रहा। अब कोई मवेशी गोठान में नहीं है। इस बारे में मुख्य कार्यपालन अधिकारी गरियाबंद हरिराम सिदार से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि गर्मी की वजह से लोग अधिकतर मवेशी को खुले में छोड़े देते हैं। इसलिए शायद गोठान में मवेशी नहीं दिखते होंगे। इसे दिखवाते हूं और बोर सौर सुलजा योजना के तहत मशीन डलवाने के बाद चालू हो जाएगा। बता दें कि गरियाबंद विकासखंड के अंतर्गत लगभग 40-45 गोठानों का निर्माण किया जा रहा है। कई तो पूर्ण भी हो चुके हैं, पर इस्तेमाल कहीं-कहीं हो रहा है। कई जगह गोठान बंद पड़े हैं।

ashok trivedi Desk/Reporting
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