एग्जाम मंथ में बच्चों के केयर को लेकर क्या कहती हैं कामकाजी महिलाएं, जानिए

Tabir Hussain

Publish: Mar, 14 2018 01:07:49 PM (IST) | Updated: Mar, 14 2018 01:19:06 PM (IST)

Raipur, Chhattisgarh, India
एग्जाम मंथ में बच्चों के केयर को लेकर क्या कहती हैं कामकाजी महिलाएं, जानिए


फैमिली, सोसायटी और टेंशन को लेकर वर्किंग वुमेंस ने अनुभव साझा किया।

ताबीर हुसैन@ रायपुर . एग्जाम का दौर जारी है। एेसे में बच्चों का ख्याल रखना हर मां के लिए जरूरी होता है। दिक्कत उस वक्त होती है जब मॉम जॉब करती हों। एेसे में मां के लिए थोड़ी परेशानी जरूर होती है। कामकाजी महिलाओं को घर और वर्क को लेकर काफी कुछ सामंजस्य बैठाना होता है। चूंकि दोनों अहम जिम्मेदारी है। आज शहर की वर्र्किंग वुमेंस बताया कि एग्जाम टाइम में वे बच्चों की केयर कैसे करती हैं। घर-परिवार और समाज में किस तरह भागीदारी निभाती हैं और खुद को तनाव से दूर कैसे रखती हैं।

रिवीजन करवाकर पढ़ाने की करती हूं कोशिश

निधि शर्मा तिवारी, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश
बच्चों को पढ़ाने के लिए अलग से समय निकालना संभव नहीं हो पाता है इसलिए दैनिक कार्यों के दौरान ही रिवीजन करवाकर पढ़ाने का प्रयास करती हूं। परीक्षा के समय रिवीजन सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए सालभर नियमित रूप से पढ़ाने के अतिरिक्त परीक्षा के समय दैनिक कार्यों जैसे खाना खाते समय, टीवी देखने के दौरान, सोने से पहले रिवीजन कराने का प्रयास करती हूं। सामाजिक दायित्वों को यथा संभव निर्वहन करने का प्रयास करती हूं। विगत 12 वर्षों के कार्यकाल के बाद घर-परिवार के लोग अब मेरे कार्यों ओर व्यस्तताओं को समझने लगे हैं इसलिए चीजें पहले की तुलना में आसान हो गई हैं। मैंने कभी भी सुपर वुमेन बनने का प्रयास नहीं किया। अपने हर एक काम को अपनी पूरी क्षमता और उत्साह के साथ सहज रहकर करने की कोशिश की है इसलिए सामान्य रूप से तनाव नहीं होता है। फिर भी कुछ परिस्थितियों में तनाव होने पर परिवार व बच्चों के साथ भरपूर समय बिताती हूं, अपने लोगों के बीच खुलकर बातें करती हूं और खुलकर हंसती हूं, जिससे तनाव मुझसे दूर ही रहता है।


रोजाना स्टडी कराती हूं

मेघा शर्मा, पुलिसकर्मी
जब बच्चों के एग्जाम चल रहे हों तो मदर को घर का सपोर्ट चाहिए होता है। क्योंंकि तभी वह बच्चों का सही ख्याल रख पाएगी। अगर किचन में हसबैंड या फैमिली मेंबर हेल्प कर दे तो बच्चों की स्टडी में ज्यादा वक्त दिया जा सकता है। दूसरी बात ये कि खुद को टीवी, खाने में तामझाम से दूर रहकर बच्चों के लिए टाइम निकाला जा सकता है। मेघा के मुताबिक बच्चों सिर्फ एग्जाम टाइम ही नहीं बल्कि रोजाना एक घंटे पढ़ाया जाए, एक साथ प्रेशर न डालते हुए थोड़ा-थोड़ा प्रिपेयर कराया जाए ताकि फाइनल एग्जाम में एकदम से प्रेशर न बने। महज रिवीजन से बच्चे समझ जाएं। परिवार और जॉब में सामंजस्य पर मेघा कहती हैं कि हफ्ते में एक दिन फैमिली मेंबर को घर बुलाएं या खुद जाएं। इससे रिलेशन मजबूत होते हैं बच्चे भी घुलमिल जाते हैं। तनाव को लेकर मेघा मानती हैं कि स्टे्रस आपकी सोच की उपज है। जब आप अपने जॉब को एंजाय करने लगते हैं तो तनाव उस रूप में नहीं आता जैसा कि लोग हौव्वा मान बैठते हैं। मैं मानती हूं कि जीवन में थोड़ी टेंशन होनी भी चाहिए, ये लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती है।

समय देने के लिए वर्किंग वुमेंस को होती है थोड़ी परेशानी

सौम्या, प्राइवेट कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर
मेरी बेटी अभी ५ साल की है। अभी मेरा मकसद उसे भरपूर प्यार देना है और उसकी हेल्थ के अलावा ग्रोथ पर ध्यान देना है। मैं उसे रोज पढ़ाती हूं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं पढ़ाई को लेकर उनका ख्याल रखना होता है। लेकिन कामकाजी महिलाएं प्रॉपर वक्त दे नहीं पाती। घर व समाज में तालमेल पर सौम्या कहती हैं कि आप भले किसी के सुख में शामिल न हो सकें लेकिन दुख में जरूर साथ देना चाहिए। रही बात तनाव की तो ये जिंदगी का अहम हिस्सा है। सरकारी कर्मियों की अपेक्षा प्राइवेट कामगारों मेें स्ट्रेस ज्यादा ही रहता है। गृहस्थी में आने के बाद कोई भी महिला और अधिक मजबूत होती है। उसका कॉन्फिडेंस बढ़ता है। क्योंकि सिर्फ पत्नी ही नहीं, बहू होती है, मां भी होती है। इसलिए कामकाज को लेकर तनाव होने के बावजूद सहनशीलता आ जाती है।

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