पूरे देश में सिर्फ यहां असली तोप चलाकर बताया जाता है सहरी और इफ़्तार का वक़्त

पूरे देश में सिर्फ यहां असली तोप चलाकर बताया जाता है सहरी और इफ़्तार का वक़्त

By: Faiz

Published: 07 Jun 2018, 04:45 PM IST

रायसेनः रमज़ान के रोज़े हर तंदुरुस्त मुसलमान पर फर्ज़ हैं। इन रोज़ों का एक तय समय होता है। जिसे सूरज निकलने का वक़्त होने से पहले रोज़े को अपने ऊपर लागू करते हुए इस बात का यकीन अपने दिल में करना होता है कि, अल्लाह को राज़ी करने के लिए में रोज़ा रखता हूं और मैं इस रोज़े की हिफाज़त बुरे कामों से बचकर और अच्छे काम करके करूंगा। साथ ही इस रोजे को तय समय पर यानि, सूरज के डूबने के बाद खोला जाता है, यानि कुछ खा कर रोज़े को पूरा किया जाता है। इस बात से आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि, रोज़े के लिए वक्त की कितनी अहमियत है। बता दें कि, रोज़े की यही अहमियत पूरी दुनिया में कही भी रोज़ा रखने वाले के लिए होती है।

रौज़ा रखने और खोलने के लिए सूरज निकलने और डूबने का इस्लामिक तौर पर बिल्कुल सही टाइम मौजूद है, जिसके हिसाब से तय होता है कि, रोज़ा खोलने और रखने का सही वक्त क्या होगा। इन्ही दोनो वक़्तो पर आम तौर पर लोग हवा में पटाख़े वाला रॉकेट छोड़कर भी वक़्त होने के बारे में बता देते हैं। इसी तरह पहले के ज़माने में जब वक्त देखने का कोई सही तरीक़ा नही था उस वक़्त के नवाब, जागीरदार तोप चलाकर इन दोनों वक़तों के बारे में बता देते थे, लेकिन यह चीज़ वक्त के साथ खत्म हो गई, लेकिन आज भी मध्य प्रदेश का एक ज़िला ऐसा है, जो रोज़े और सहरी के सही वक्त पर लोगों को तोप चलाकर जानकारी देता है।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के 45 किलोमीटर की दूरी पर है रायसेन शहर वैसे तो इसका ज़िला पूरे प्रदेश में सबसे बड़ा है, लेकिन यह परम्परा सिर्फ इस शहर की ही है, जो पिछले 200 सालों से चली आ रही है। यहां रमज़ान के दिनो में सेहरी और इफ्तारी के लिए किले से तोप चलाई जाती है। यहा तोप सिर्फ रमज़ान के दिनों में ही चलाई जाती है, जैसे ही रमज़ान का चांद दिखता है, तो शहर तोप की आवाज़ों से गूंज उठता है। इसी से यहां रमज़ान का आगाज होता है फिर 30 दिनों तक सुबह सेहरी और शाम को इफ्तार के वक़्त यह सिलसिला रोज़ाना बना रहता है। आपको बता दें कि, देश में सिर्फ रायसेन ही ऐसा शहर है जहां रोज़दारों को तोप की गूंज का इंतजार रहता है।

रायसेन मुख्‍यालय पर रखी प्राचीन दुर्ग की प्राचीर से चलने वाली तोप पहले के मुकाबले काफी छोटी हो गई है, इसके पीछे की वजह है, जर्जर हो रहा किला, ताकि धमक से कहीं इमारत को नुक़सान ना हो। इसे सिप्पा तोप कहा जाता है और बकायदा इसके लिए एक माह का अस्‍थायी लाइसेंस डीएम द्वारा मुस्लिम त्‍योहार कमेटी को दिया जाता है। 1 माह तक सुबह शाम तोप चलने में लगभग 50 हजार का व्यय आता है। जिसमें नगरपालिका द्वारा 7000, शहर काजी द्वारा 5000 और बाकी चंदे के रूप में जमा किया जाता है।

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