आसानी से रसोई गैस उपलब्ध होने लगी, तो लोग बायो गैस संयंत्र में नहीं लेते रुचि

गांव-गांव में उज्जवला योजना ने भी बायोगैस संयंत्र योजना में लोगों की रुचि कम कर दी है

By: chandan singh rajput

Published: 30 Sep 2020, 02:04 AM IST

बेगमगंज. शासन की बायोगैस संयंत्र योजना के तहत लोगों को कम लागत में गैस उपलब्ध कराने की योजना में मजदूरों और पशुओं की कमी के कारण पानी फिरता नजर आ रहा है। लोग इस योजना में रुचि नहीं दिखा रहे। वहीं दूसरा कारण गांव-गांव में उज्जवला योजना ने भी बायोगैस संयंत्र योजना में लोगों की रुचि कम कर दी है। यही कारण है कि कृषि विभाग को जो लक्ष्य दिया जाता है, वह भी मुश्किल से पूरा हो पाता है, जबकि पूर्व के वर्षों की भांति लक्ष्य को 33 प्रतिशत कर दिया है। वर्ष 2014 में जहां 17 का लक्ष्य दिया गया था- वहीं वर्ष 2018-19 में मात्र पांच का लक्ष्य दिया गया। जिसे पूरा कराने में ही अधिकारियों को पापड़ बेलना पड़े। यही हाल वर्ष 2019-20 का भी है कि लक्ष्य पूरा ही नहीं हो सका। वर्ष 2014 में कृषि विभाग को मिले 17 बायोगैस संयंत्र बनवाने का लक्ष्य में आधा भी पूरा नहीं हो सका। मात्र सात बायोगैस संयंत्र ही बन पाए थे, जबकि बायोगैस संयंत्र में सब्सिडी भी दी जा रही है।

पहले से बढ़ा दिया अनुदान
वहीं लक्ष्य पूरा न होने में कुछ विसंगतियों के चलते रुचि नहीं लेना सामने आ रहा है। इस कारण योजना की अनुदान राशि में संसोधन किया गया। इसके बाद भी सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। वर्तमान में संशोधन के बाद प्रदेश सरकार द्वारा सामान्य वर्ग के लिए 11 हजार व केंद्र सरकार द्वारा ढाई हजार कुल 13500 रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा एससी, एसटी और पिछड़ा वर्ग के लिए राज्य सरकार द्वारा 12 हजार एवं केंद्र सरकार की तरफ ढाई हजार रुपए सहित कुल 14500 रुपए का अनुदान दिया जा रहा है, जबकि पूर्व में अनुदान की राशि साढ़े दस हजार रुपए थी। बायोगैस संयंत्र बनवाने में करीब 25 हजार का खर्चा आता है। इसके बाद भी लोग शासन की अनुदान योजना का लाभ उठाने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

बायोगैस संयंत्र नहीं बनवाने के कारण
बायोगैस संयंत्र न बनने का एक कारण पशुओं की संख्या में कमी होना भी है। पशुओं के बगैर यह संयंत्र नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि इसमें गोबर की आवश्यकता पड़ती है। अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी पशुओं की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है। दूसरा कारण बायोगैस संयंत्र में गोबर का घोल डालने के लिए मजदूर नहीं मिलते। तीसरा कारण एलपीजी गैस के ग्रामीण वितरक नियुक्त होने से ग्रामीण सीधे तौर पर एलपीजी कनेक्शन लेकर उपयोग कर रहे हैं। वहीं शासन ने उज्जवला योजना में घर-घर गैस सिलेंडर बांट दिए हैं। कुछ लोगों को आसानी से जलाऊ लकड़ी प्राप्त हो जाती है, तो वे झंझट में नहीं पडऩा चाहते।

लाभ की तरफ नहीं पशुपालक व किसान का ध्यान
बायोगैस संयंत्र से गैस तो मिलती ही है, साथ ही घर की बिजली भी जलाई जाती और भोजन आदि भी तैयार किया जाता है। इससे गोबर की खाद भी निकलती है। कृषि विभाग के अधिकारियों की माने तो यह खाद जमीन के लिए अधिक लाभदायक है, क्योंकि गोबर का खाद जमीन को उपजाऊ बनाता और किसी तरह की हानी इसकी खाद से नहीं होती है।
- पिछले वर्ष जो लक्ष्य मिला था, वह मजदूरों व पशुओं की कमी के चलते किसानों द्वारा इसमें रुचि नहीं ली गई, जबकि पहले के मुकाबले अनुदान की राशि बढ़ा दी गई है। पहले जिन किसानों ने यह संयंत्र बनवाए, उनके संयंत्र सफ ल हैं उन्हें गैस और खाद उपलब्ध हो रही है, जिसके उपयोग से वे अधिक उपज ले रहे।
- जेपी तिवारी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी।

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