scriptraisen, geetabai ne banai apni alag pahchan | गीता बाई ने मछली पालन और जैविक खेती से बनाई पहचान | Patrika News

गीता बाई ने मछली पालन और जैविक खेती से बनाई पहचान

आठवीं तक शिक्षित गीता बाई बनी दूसरों के लिए प्रेरणा।

रायसेन

Published: January 20, 2022 09:23:17 pm

रायसेन. जिले की सिलवानी तहसील के आदिवासी बाहुल्य गांव सियरमऊ निवासी गीता बाई ने परंपरा से हटकर जैविक खेती के साथ मछली पालन कर अपनी अपनी पहचान बनाई है। आठवीं तक पढ़ाई करने वाली गीता बाई कुशवाह गांव की महिलाओं के लिए जैविक खेती, मच्छली पालन के साथ साथ कड़क नाथ मुर्गा पालन के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गई हैं। जिससे ग्राम सियरमऊ में बदलाव देखने को मिल रहा है।
गीता बाई ने 0 बजट में खेती करने की ठानी जिसमें शुरूआत में उनको काफी परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं किए और लगातार कठिन परिश्रम करते हुए जैविक खेती करने से अब प्रतिवर्ष 10 से 12 लाख रुपए से ज्यादा की आय प्राप्त कर रही हैं। जिससे गांव में अन्य महिलाओं के लिए भी गीता बाई प्रेरणा का स्त्रोत बन गई है।
गीता बाई के सामने आर्थिक परेशानी थी, उन्होंने अजीविका मिशन के समूह से जुड़कर प्राप्त होने वाली चक्रीय राशि से जैविक तरीके से सब्जी की खेती की शुरूआत की। तमाम कठिनाईयों पर जीत हासिल कर वर्तमान में 3 एकड़ भूमि में जैविक तरीके से अदरक, लहसुन और प्याज की खेती कर रही हैं। इसके अलावा पपीता भी लगाया है। इसी के साथ महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत खेती के लिए अनुउपयोगी हो चुकी भूमि पर एक तालाब से मछली पालन की शुरूआत की। धीरे धीरे मछली पालन का दायरा बढ़ाते हुए 7 तालाब तक पहुंच गया है। मछली पालन से ही वो 5 से 7 लाख रुपए सालाना कमा रही हैं।
गीता बाई केचुआ खाद बनाने के साथ कीटनाशक दवाएं भी स्वयं तैयार कर उपयोग करती हैं। जैविक खेती को अपनाने से लोग उनके घर से ही सब्जी घर से खरीद कर ले जाते हैं। जिससे उनको अच्छा दाम मिल रहा है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी रासायनिक मुक्त सब्जी लोगों को मिल रही है।
गीताबाई का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारन के लिए कुछ नया करने की जरूरत थी, जिसके प्रयास किए। हालांकि इसमें शुरुआत में बहुत समस्याएं आईं, लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया और आज मछली पालन, जैविक खेती से अच्छी आय हो रही है।
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गीता बाई ने मछली पालन और जैविक खेती से बनाई पहचान
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