पैदल चलकर घर पहुंचने की उम्मीद में पड़े छाले

कोई गुजरात से तो कोई महाराष्ट्र से पैदल चलकर जा रहे अपने घर। जिले से निकल रहे कई मजदूर।

By: praveen shrivastava

Published: 10 May 2020, 09:49 PM IST

रायसेन. लॉकडाउन 3.0 शुरू होने के बाद उन मजदूरों की उम्मीदें टूट गई जो जहां थे वहीं फिर से अपना जीवन शुरू करने की उम्मीद लगा रहे थे। मजबूरी में हजारों ऐसे मजदूरों ने पैदल ही घर की राह पकड़ ली। कई मजदूर तो सैकड़ों किमी का सफर पैदल कर चुके हैं और अभी इतना ही और चलना है। पैरों में छाले पड़ गए हैं, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी है। घर पहुंचकर राहत मिलेगी इसी उम्मीद में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। रविवार के ही जिले से ऐसे कई मजदूर गुजरे जो अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। जानकारी मिलने पर प्रशासन ने भोजन के इंतजाम कराए और वाहन का इंतजाम कर जिले से बाहर तक छोड़ा। पैदल चलते हुए इन मजदूरों को ऐसी मदद रास्ते में मिलती रही है, लेकिन अधिकतर सफर पैदल ही करना पड़ा है।
सूरत से सतना जा रहे 11 मजदूर
बेगमगंज. गुजरात के सूरत में काम बंद होने से बेरोजगार हुए 11 युवा निराश होकर अपने घर सतना के लिए पैदल ही चल दिए। पांच दिन में ये मजदूर बेगमगंज पहुंचे।
मजदूरों ने बताया कि कहीं पर खाना मिला तो कहीं पर नहीं। लेकिन मध्यप्रदेश के आम लोगों ने बहुत मदद की, चाय भोजन रास्ते में मिलता रहा। लेकिन गुजरात सरकार से कोई मदद नहीं मिली। युवक संदीप यादव ने बताया कि दो साल पहले रोजगार की तलाश में सूरत गए थे। वहां एक कपड़ा कंपनी में काम किया। लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया। ऐसे में कुछ दिन तो गुजारा किया, जब भूखे मरने की नौबत आ गई तो घर जाने का निर्णय लिया। वाहन तो थे नहीं, इसलिए पैदल ही चल दिए।
घर पर सूखी रोटी खा लेंगे पर बाहर नहीं जाएंगे
मजदूर युवक परसोत्तम, राजकुमार यादव, राजभान, शिवनाथ, रविंद्र, मनोज सिंह, मंगल, का कहना था कि अब घर पर भले ही रूखी सूखी रोटी खाएंगे, लेकिन अब अन्य प्रदेश काम करने नहीं जाएंगे।
गुरुग्राम से पंद्रह दिन पहले निकले थे
बरेली. हरियाणा के गुरुग्राम से गोटेगांव के लिए पैदल निकले चार मजदूर साढ़े आठ सौ किलोमीटर की दूरी तय कर रविवार को चिलचिलाती धूप में बरेली पहुंचे।
यहां सूचना लगते ही टीम पहल ने मजदूरों को भोजन कराने के बाद प्रशासन की अनुमति के साथ वाहन से घर गोटेगांव के पास सोजनी तक भेजने की पूरी व्यवस्था की।
ये चारों मजदूर फरवरी माह में टाइल्स लगाने का काम करने हरियाणा के गुरुग्राम गए थे। लॉक डाउन के साथ ही काम बंद हो गया था। इन चार मजदूरों के अलावा अन्य प्रदेशों के मजदूर धीरे धीरे कर अपने अपने घरों की ओर निकल गए। जब तक खाने की व्यवस्था रही गोटेगांव के चारों मजदूर लॉक डाउन खुलने का इंतजार करते रहे। 15 दिन पहले जब भोजन व्यवस्था के लिए जेब में रुपए खत्म हो गए तो पैदल ही गोटेगांव के लिए निकल पड़े।
किसी ने दुत्कारा तो किसी ने की मदद
मजदूर दशरथ ठाकुर ने बताया रास्ते में कुछ लोगों ने दुत्कारा तो कुछ लोगों ने दया दिखाते हुए खाना भी खिलाया और आर्थिक मदद भी की। पैदल चलते चलते पैरों में छाले पड़ गए हैं। कई बार तो जिंदा घर पहुंचने का भरोसा ही टूटने लगा था। थकान के कारण जब चलने की हिम्मत नहीं रहती तो, जहां जगह मिल जाती थी सो जाते थे। थकान कम होते ही चल पड़ते थे।
घर वालों होता रहा संपर्क
चारों के बीच एक मोबाइल है। जिससे सभी का अपने घर वालों से संपर्क होता रहा। जब मोबाइल डिस्चार्ज हो जाता था तो रास्ते में लोगों से मिन्नतें करके चार्ज कर लेते थे।
सुरक्षित घर पहुंचा दे सरकार
जेब में खाने तक के लिए रुपए नहीं बचे। पैरों में छालों के कारण चलते भी नहीं बन रहा। सरकार से इतना चाहते है कि सुरक्षित घर पहुंचा दे। मजदूर राजा ठाकुर, दशरथ ठाकुर, प्रदीप ठाकुर और रमेश ठाकुर ने सहायता के लिए टीम पहल के प्रति आभार जताया।
औरंगाबाद से गोरखपुर के लिए निकला साइकिल से
औरंगाबाद में एक फैक्ट्री में काम करने वाला अखिलेश शर्मा रविवार को साइकिल चलाते हुए रायसेन से गुजरा। उसने बताया कि छह दिन पहले औरंगाबाद से निकला था, अपने घर गोरखपुर जाना है। फैक्ट्री में तीन साल से काम कर रहा था, लॉकडाउन में काम बंद हुआ और गुजारे के लिए पैसे नहीं बचे तो अपनी साइकिल लेकर घर के लिए निकल गया। रास्ते में समाजसेवियों से भोजन मिलता रहा। कई बार भूखे भी रहना पड़ा। कई जगह पुलिस की फटकार भी झेली। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। हर दिन परिवार वालों से मोबाइल से बात कर उन्हे जल्द घर पहुंचने की सांत्वना देता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।

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