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अलविदा जुमा पर रोजेदारों ने मांगी अमन चैन की दुआ

रमजान के आखिरी जुमा पर मस्जिदों में नमाजियों की उमड़ी भीड़

रायसेन

Updated: April 30, 2022 12:02:42 am

सलामतपुर. रमजान के आखिरी जुमा के दिन शुक्रवार को सलामतपुर सहित आसपास क्षेत्रों की मस्जिदों में नमाजियों की भीड़ उमड़ी। मस्जिदों के बाहर और छतों पर भी नमाज पढऩे की व्यवस्था की गई। जामा मस्जिद के पेश इमाम नसीम अहमद ने जुमे की तकरीरों में रोजा, फितरा, जकात के संबंध में जानकारी दी और ईद की नमाज का समय तय किया गया। सलामतपुर ईदगाह में सुबह साढ़े सात बजे ईद की नमाज अदा की जाएगी। नमाज के बाद देश और दुनिया में खुशहाली, भाईचारे और अमन चैन की दुआ कराई गई। जुमा तकरीरों में कहा गया कि रमजान के महीने के दौरान रोजेदारों में भूख, प्यास समेत हर तरह की सख्ती बर्दाश्त करने की आदत हो जाती है।

रमजान के आखिरी जुमा पर मस्जिदों में नमाजियों की उमड़ी भीड़
अलविदा जुमा पर रोजेदारों ने मांगी अमन चैन की दुआ

रमजान का मकसद यह है कि लोग दूसरों की तकलीफों को समझें। लोग दूसरों की मदद अपने सामथ्र्य के अनुसार करते रहें, जिससे कोई भी जीवन के लिए जरुरी चीजों से वंचित न रहे। लोग फितरा-जकात जरुर निकालें, पेश इमाम ने इसकी अहमियत बताई। उलेमा ने बताया कि यदि आपका रिश्तेदार गरीब हो और वह शर्म की वजह से अपनी तकलीफ न बताता तो हो तो अन्य तरह से उसकी मदद करें, नेक-नीयती जरुरी है। वहीं फितरा ईद की नमाज से पहले दें। लोगों से कहा गया कि जिस तरह रमजान में इबादत की है, उसी तरह पूरे साल करें।

जामा मस्जिद में 27 दिन की तरावीह हुई मुकम्मल
सलामतपुर. कस्बा की जामा मस्जिद में गुरुवार रात्रि को 27 दिन की तरावीह पूरी हुई। इस दौरान तरावीह पढ़ाने वाले मदरसतुल ईमान जामा मस्जिद सलामतपुर के तालिबे इल्म हाफिज मोहम्मद नजर निवासी बांसखेड़ा को हदिए के रुप में नई मोटर साइकिल दी गई। तरावीह के बाद जामा मस्जिद के पेशे ईमाम नसीम अहमद ने मुल्क में अमन ओ चैन के लिए दुआ की। दुआ के बाद बस्ती के सभी लोगों को तबर्रुख बांटा गया। वहीं पेशे ईमाम नसीम अहमद ने बताया कि माह-ए-रमजान की सत्ताइसवीं रात को ही शब-ए-कद्र यानी परम समाननीया रात कहा जाता है। यह अल्लाह की खास मेहरबानी की रात है।

इसीलिए अमूमन इसे ही शब-कद्र कहा जाता है। क्योंकि इसे परम पवित्रता का दर्जा प्राप्त है। छब्बीसवां रोजा इसीलिए मुकद्दस पवित्र कहा जाता है क्योंकि इस दिन रोजा इफ्तार के बाद सत्ताइसवीं रात शुरु हो जाती है। जिसे शब-ए-कद्र कहा जाता है। यह रात शब-ए-कद्र इबादत के लिहाज से ऊंचा मुकाम रखती है। शब का मतलब है रात, शब-ए-कद्र का मतलब है समान। इस तरह शब-ए-कद्र के मायने हुए समान की रात। रमजान माह के आखिरी अशरे यानी निजात मुक्ति, छुटकारा के अशरे में आने वाली शब-ए-कद्र दरअसल समान की रात है। क्योंकि इसी रात को पवित्र कुरआन का नुजूल हुआ था। सूरहकद्र में जिक्र है यानी अल्लाह का इशारा है कि यकीनन हमने इसे कुरआन को शब-ए-कद्र में नाजिल किया। शब-ए-कद्र हजार महीनों से बेहतर है। इसमें इबादत यानी अल्लाह की इनायत होना है।

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