आधुनिक हुआ ब्यावरा रेलवे स्टेशन लेकिन डिजिटल डिस्प्ले नहीं होने से भटकते हैं यात्री, कोच ढूंढऩे में होती है परेशानी

- रेलवे स्टेशन ब्यावरा
- सालभर पहले खर्च कर डाले तीन करोड़, फिर भी मूल सुविधाएं नहीं मिल रही, अतिरिक्त टिकिट खिड़की नहीं बनने से आती है दिक्कत

ब्यावरा. कहने को आधुनिक रेलवे स्टेशन ब्यावरा को बना दिया गया है लेकिन यहां यात्रियों को मूल सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। बीते साल ही यहां करीब दो से तीन करोड़ रुपए मरमत और दिखावटी काम में खर्च कर दिए थे फिरभी मूल जरूरत की सुविधाएं यात्रियों को नहीं मिल पा रही।

दरअसल, मक्सी-रुठियाई रेल्वे ट्रेक के मुय स्टेशन ब्यावरा में ट्रेन नंबर और कोच दिखाने वाला डिजिटल डिस्प्ले नहीं होने के कारण यात्रियों की फजीहत होती है। उन्हें अपना कोच ढूंढऩे मे खासी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा रात के समय ट्रेन के आखिरी छोर की ओर अंधेरा रहता है जिससे हमेशा हादसे का डर बना रहता है। इसकेअलावा कहने को करोड़ों रुपए खर्च किएगए हैं लेकिन प्लेटफॉर्म क्रमांक-एक में पानी के पानी, टॉयलेट, महिला टॉयलेट, शौचालय इत्यादि की दिक्कत है।

वहीं, दो नंबर प्लेटफॉर्म पर तो ढंग से रोशनी तक नहीं है न ही बैठने की व्यवस्था। इसी कारण वहां शुरू किया गया कैंटीन कुछ ही दिन में बंद करना पड़ा। 98 लाख से बनाया गया फुट ओव्हर ब्रिज भी सिंबोल बना हुआहै,उसका उपयोग भी एक तरफ होने के कारण यात्री नहीं कर पा रहे हैं।

रात के समय डर के साथ परेशानी भी
स्टेशन पर आधी रात को आने वाली इंटरसिटी और अन्य साप्ताहिक गाडिय़ों में बैठने पहुंचने वाले यात्रियों को डिस्प्ले नहीं होने के खासा परेशान होना पड़ता है। ब्यावरा सहित जिलेभर से आने वाले यात्रियों को इसके कारण परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

यात्री दीप्तिका पाटीदार, भगवतीदेवी अग्रवाल, रितू अग्रवाल, राधेश्याम, गोकुल यादव सहित अन्य ने बताया कि रात में जब हम लोग कोच ढूंढऩे जाते हैं तो ट्रेन में समझ ही नहीं आता। रात के समय तो ट्रेन के दूसरे छोर पर जाने में भी डर लगता है।


उखड़वा दिए थे लगे हुएअच्छे टाइल्स
उल्लेखनी है कि पिछले साल हुए जीएम और सीआरएम टीम के निरीक्षण को लेकर रेल्वे ने करीब दो से तीन करोड़ रुपएबाहरी चकाचौंध के लिएखर्च कर दिए थे। इसमें स्टेशन परिसर के ऐसे टाइल्स भी उखड़वा दिए गए थे जो काफी अच्छे थे।

साथ ही कोटा स्टोन और पहले से लगे हुए पत्थर के ऊपर ही सीसी कर दिया गया, जिसका कोई निरीक्षण इंजीनियरिंग टीम ने भी नहीं किया। वहीं, स्टेशन परिसर में पार्किंग के लिएस्टील की रैलिंग लगाईगईलेकिन उसकी क्वालिटी भी ढंग की नहीं होने के कारण वह उखडऩे लगी। यानि कुल मिलाकर रेल्वे का पैसा बर्बाद जरूर हुआलेकिन जनता को लाभ नहीं हुआ।

15 दिन भी नहीं चली पैड पार्किंग
सीआरएम और जीएम के निरीक्षण के दौरान स्टेशन के बाहर टू और फोर व्हीलर वाहनों के लिए पैड पार्किंग शुरू की गई थी, जिसमें पांच और 10 रुपए पार्किंग शुल्क था लेकिन वह महीनेभर भी नहीं चल पाई। जागरूकता के अभाव और लोगों की रुचि कम होने के कारण पार्किंग का उपयोग ही नहीं हो पाया। नजीता यह रहा कि निजी वेंडर को उक्तपार्किंग बंद करना पड़ी।

शुरू नहीं हो पाई अतिरिक्त खिड़की
दूसरी सबसे जरूरत स्टेशन पर अतिरिक्त एकल खिड़की थी, जिसमें समय पर यात्रियों को टिकिट मिल पाए लेकिन स्टेशन मास्टर और एक मात्र रिजर्वेशन काउंटर के भरोसे पूरी व्यवस्थाएं हैं। इसमें कई बार पैनल को संभालने में यात्रियों को स्टेशन मास्टर टिकिट नहीं बांट पाते। कई बार यात्रियों को बिना टिकिट ही ट्रेन में चढऩा पड़ता है। इसके अलावा कई बार जल्दबाजी में काउंटर पर रुपयों की लेनदेन में कभी यात्री तो कभी काउंटर वाले को नुकसान हो जाता है।

मंडल स्तर के हैं ये निर्णय
डिस्प्ले सहित अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं का काम मंडल स्तर का है, उन्हीं को इसमें निर्णय लेना होता है। टिकिट विंडो की कई बार हम भी मांग रख चुके हैं, एक ही होने के कारणदिक्कत तो आती है, यात्री भी परेशान होते हैं, हम फिर मांग रखेंगे।
- पीएस मीना, स्टेशन मास्टर, ब्यावरा

Rajesh Kumar Vishwakarma Reporting
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