पांच दिन से ट्रेन में ही फंसे थे पैंट्री कर्मचारी, ब्यावरा में उतारा, स्क्रीनिंग के लिए मेडिकल टीम के पहुंचने से पहले ही रवाना हुए

इन परिवारों के लिए दुखदाई हुआ लॉक डाउन...
पुणे-ग्वालियर ट्रेन से ब"ाों और परिवार सहित आए 150 से अधिक पैंट्री कर्मचारियों को स्टेशन पर रोका, भोपाल मंडल से थे रोकने के निर्देश, सभी रेल्वे कर्मचारी होने पर छोड़ा, प्रशासन की टीम बाद में पहुंची

ब्यावरा.देशभर में पूरी तरह से बंद ट्रेनों की आवाजाही के बीच गुरुवार को ब्यावरा पहुंची पुणे-ग्वालियर एक्सप्रेस में आए करीब 150 से अधिक लोगों को देख हड़़कंप मच गया। उन्हें स्टेशन पर उतारा गया और स्वास्थ्य-प्रशासन की टीम को अवगत करवाया गया। करीब 35 मिनट तक वे स्टेशन पर ही रहे लेकिन स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन की कॉम्बेक टीम आने से पहले ही रेल्वे ने उन्हें रवाना कर दिया।
दरअसल, उक्त लोग पैंट्री कर्मचारी थे जो कि करीब तीन से चार दिन से ट्रेन में ही फंसे थे। उन्हें एक दिन पहले से खाने-पीने की भी दिक्कत आ रही थी। पत्नी, ब"ाों के साथ ही वे ट्रेन में ही थे। रेल्वे प्रबंधन का कहना है कि वरिष्ठ कार्यालय से निर्देश थे कि इन लोगोंकी जांच की जाए कि ये हैं कौन, उसके बाद ही रवाना किया जाए, इसीलिए इनकी स्क्रीनिंग की गई। पुणे से आए तमाम कर्मचारियों की वैसे स्क्रीनिंग की जाना थी लेकिन मेडिकल टीम काफी देर से पहुंची तब तक वे जा चुके थे। हालांकि इसमें विभागीय तर्क यह भी था कि वे यहां के नहीं थे इसलिए या तो उन्हें रोककर यहीं आइसोलेट करना पड़ता या कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था की जाती? वहीं, रेल्वे के उक्त पैंट्री कर्मचारियों का कहना है कि हमारी कोई स्क्रीनिंग कहीं नहीं हुई। हम सीधे अपने गांव जाना चाहते हैं। खाने की दिक्कत आ रही थी, राशन, तेल और अनाज कुछ भी हमारे पास नहीं बचा। ऐसी स्थिति में समय निकाल पाना मुश्किल हो रहा था। उधर, रेल्वे का तर्क है कि पुणे के यार्ड से उक्त खाली गाड़ी को ग्वालियर भेजा गया है ताकि जब भी रेल्वे शुरू हो तो दोनों से यथावत गाडि़य़ां चालू हो जाए।

सोशल डिस्टेंस टूटा, जहां थे वहां नहीं मिली कोई सुविधा!
पीएम के बार-बार के अह्वान के बाद इन मजदूर वर्ग के पैंट्री कर्मचारियों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ध्यान किसी ने नहीं रखा गया। यहां तक कि पूरी तरह के लॉक डॉउन के बाद भी इनकी व्यवस्थाओं का किसी ने जायजा नहीं लिया। उनके राशन, पानी किसी की परवाह न रेल्वे ने की न ही प्रशासनिक स्तर पर किसी अन्य जिम्मेदार ने। पैंट्री में जब तक खाना था तब तक इनका काम चलता रहा, फिर इन्हें बोल दिया गया कि घर जाओ। गाडिय़ां सभी बंद हैं और ये लोग फंसे हुए थे। ऐसे में जीविकापार्जन भी इनके सामने बड़ी चुनौती थी। अब वे ग्वालियर जाकर भी पैदल जाने को मजूबर हैं। बीच के स्टेशनों पर उनकी वास्तविक स्क्रीनिंग इसलिए नहीं हुई कि कोई रिस्क लेना ही नहीं चाहता।
ऊपर से निर्देश थे रोकने के
ऊपर से ही निर्देश कि उक्त गाड़ी को रोड को रोककर चेक किया जाए कि कोई आउटर तो नहीं है। कोई बाहरी व्यक्ति तो सफर नहीं कर रहा। इसीलिए हमने रोका था, सभी की आईडी देखी तो पाया कि पैंट्री कर्मचारी थे, अपने परिवार के साथ जा रहे थे, जिन्हें &0-&5 मिनट बाद रवाना कर दिया।
-मुकेश मीणा, उप-स्टेशन प्रबंधक, ब्यावरा
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Rajesh Kumar Vishwakarma Reporting
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