कोरोना महामारी से निपटने के लिए पूरे देश में लाॅकडाउन जारी है। पीएम से लेकर सीएम तक, मंत्री से लेकर अधिकारी तक घरों में रहने की नसीहत दे रहे हैं। फिर भी समाज का एक सबसे महत्वपूर्ण तबका मजदूर वर्ग भूख-प्यास से बेबस पैदल चलने को मजबूर है। इन बेबसों को बीमारी से अधिक ऐहतियात, भूख को लेकर है। ये चल रहे ताकि इनकी चल रही सांसें भूख की वजह से न थम जाए। गांव ही इनकी अंतिम आस है, इसी आस के साथ रोज ‘विदेसियों’ का एक रेला पैदल ही निकल पड़ा है अपने ‘देस’। किसी के साथ उसकी गर्भवती पत्नी पैदल साथ निभा रही तो किसी की गोद में दूधमुंहे बच्चे हैं। कुछ मजबूरन व्हीलचेयर पर ही अपने अपनों को ढोने को मजबूर हैं।
मुमकिन है आप इन पैदलियों के बारे में यह सोचे कि आपके शहर या क्षेत्र को, यह आकर संक्रमित कर देंगे लेकिन इनके पांव के छालों के बावजूद सिर पर गठरी ढोने की मजबूरी को देखिए, गोद में दूधमुंहे बच्चों को लेकर चलती महिलाओं, बीमार गरीबों, बुजुर्ग की इस बेबस यात्रा को इनके नजरिए से देखें-सोचे ताकि इंतजामिया के दावों की हकीकत का भी अंदाजा लग सके।
बहरहाल, हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर अपनी 'गांव-यात्रा' पर हैं। इनकी यात्रा को मशहूर कवि शलभ श्रीराम सिंह की इन पक्तियों के साथ तसल्ली से निहारते रहिए...

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्वाब क्या हुए
तुझे था जिनका इन्तजार वो जवाब क्या हुए
तू इनकी झूठी बात पर
ना और ऐतबार कर
के तुझको साँस-साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
नफस-नफस कदम-कदम बस एक फिक्र दम-ब-दम
जवाब-दर-सवाल है, हमें जवाब चाहिए

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