जीवनदायनी का अस्तित्व खतरे में, आधुनिकीकरण व लापरवाही ने ली यहां नदियों की जान

आज से 20 साल पहले गंडई की नदियों में इतना कम पानी वर्ष के किसी भी माह में देखने को नहीं मिलता था। पूरे वर्ष भर पानी समुचित मात्रा में उपलब्ध रहता था परंतु बीते कुछ सालों में नदियों के साथ खिलवाड़ किया गया है जिसका नतीजा अब देखने को मिल रहा है।

By: Dakshi Sahu

Published: 07 Jan 2019, 01:16 PM IST

रोहित देवांगन @ राजनांदगांव /गंडई पंडरिया. इतिहास की किताबों को अगर खोलकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि किसी भी संस्कृति का बसाव नदियों के किनारे पर होता है चाहे वो हड़प्पा संस्कृति हो या मोहनजोदड़ो। आज भी भारत के अधिकांश गांव, कस्बे या शहर का बसाव नदियों के किनारे ही है। नदियां किसी शहर या गांव की सम्पन्नता का प्रतीक मानी जाती हैं परंतु वर्तमान परिवेश को देखते हुए लगता है कि अब नदियां केवल नक्शे में ही देखने को मिलेंगी।

आधुनिकीकरण की दौड़ में इंसान इतना अंधा हो गया है कि प्रकृति से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है। अभी जनवरी माह में ही नदियों में पानी एक बड़े नाले से भी कम की मात्रा में देखने को मिल रही है जो एक गम्भीर मुद्दा है। आज से 20 साल पहले गंडई की नदियों में इतना कम पानी वर्ष के किसी भी माह में देखने को नहीं मिलता था।

पूरे वर्ष भर पानी समुचित मात्रा में उपलब्ध रहता था परंतु बीते कुछ सालों में नदियों के साथ खिलवाड़ किया गया है जिसका नतीजा अब देखने को मिल रहा है। अभी गर्मी शुरू नही हुई है और नदियों में पानी नहीं है। गर्मियों में नदियां सूख जाएंगी और लोगों को निस्तारी सहित अन्य कामों में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सीएमओ नगर पंचायत गंडई योगेश्वर उपाध्याय ने बताया कि जनप्रतिनिधियों से चर्चा कर व आम जन के सहयोग से नदियों की साफ सफाई की जाएगी। इस ओर जल्द ही समुचित पहल करेंगे।

मुहाने पर बांध बना मुसीबत
जल संरक्षण के नाम पर क्षेत्र के पैलिमेटा सहित पूरे भारत में जहां भी बांध का निर्माण हुआ है नदियों के मुहाने पर किया गया है जो नदियों के अस्तित्व के लिए खतरा है। पहले तो मौसम चक्र सही होने के वजह से इतना विकट स्थिति निर्मित नही होती थी लेकिन अब प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, बेरहमी से जंगलो में पेड़ों को काटकर जंगल का सफाया किया जाना, नदियों का सीना चीर रेत माफियाओं द्वारा रेत का अवैध दोहन, पहाड़ों को तोड़कर पत्थरों का अवैध दोहन व आधुनिकीकरण के नाम पर बिना मापदंड के फैक्ट्रियों का संचालन किया जाना मौसम चक्र को लगातार प्रभावित करने लगा है जिसके कारण आज नदियों का अस्तित्व खतरे में पडऩे लगा है।

झिरिया के पानी से प्यास बुझाते थे लोग
पंडरिया स्थित नदी में 10 साल पहले तक नदी में पानी का इतना श्रोत था कि लोग हर श्रोत (ओगरे) में छोटे छोटे झिरिया (पत्थरो को रच कर चौकोर आकार में टंकी बनाना) बनाते थे इन प्राकृतिक श्रोतों का पानी पंडरिया से लेकर गंडई तक में पूरे वर्ष भर पानी की कमी नहीं होने देता था। झिरिया का पानी इतना साफ होता था कि लोग इसे पीने के लिए भी उपयोग करते थे, परंतु लगातार नदियों से खिलवाड़ किए जाने से अब गंडई की नदियों में पानी की किल्लत होने लगी है।

इस प्रकार किया गया खिलवाड़
पचरीकरण के नाम पर प्राकृतिक स्त्रोत को सबसे पहले आंशिक रूप से क्षति पहुंचाई गई। इसके बाद सौदर्यीकरण के नाम पर जेसीबी से नदियों के प्राकृतिक परिवेश को नष्ट कर पूर्ण रूप में क्षति पहुंचाई गई। अब नगर से निकलने वाले गंदे पानी को नालियों के रास्ते नदियों में डाल दिया गया जिससे रही सही कसर भी पूरा हो गया। इस प्रकार अब नदियों का अस्तित्व खतरे में दिखाई देने लगा है।

क्या किया जा सकता है
से तो नदियों को सहेजने के लिए शासन के योजनाओं के अलावा आम जनता को भी इस ओर गम्भीर होकर ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है परंतु इसके अलावा इन बातों को अमल कर नदियों को जीवनदायनी नदियों में पुन: परिवर्तित किया जा सकता है।

बांध (जलाशय) को भरने वाली नदियों के रूट को इस प्रकार बनाया जाए कि बरसात में वो बांध को भरने का काम करे और बाकी मौसम में सीधे गांव, कस्बे या शहर की नदियों में बहता रहे।
नगर से निकलने वाले गंदे पानी को नदियों में जाने से रोका जाए। इसके लिए ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, जनपद,जिला पंचायत, नगर निगम व हर जिम्मेदार विभाग को सख्त आदेश दिया जाना चाहिए।
आम जन को नदियों में या नदियों के पार में कचरा फेंकने से रोका जाना चाहिए।
नदियों में समय समय पर साफ सफाई होनी चाहिए।
प्राकृतिक श्रोतों का संवर्धन किया जाना चाहिए।
ईंट भठ्ठे वाले या निर्माण कार्य करने वालों द्वारा नदियों के पानी के उपयोग में रोक लगाया जाना चाहिए।

Dakshi Sahu Desk/Reporting
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