पांच गांव के ग्रामीण करते हैं भैरव पहाड़ी की देख-रेख, मां दंतेश्वरी के प्रति अंचल के भक्तों में अपार श्रद्धा ...

भैरव पहाड़ी में है प्राचीन शिव लिंग, सामने पहाड़ी में विराजती है मां दंतेश्वरी

By: Nitin Dongre

Published: 20 Jul 2020, 08:19 AM IST

दिवाकर सोनी @ पत्रिका डोंगरगांव. श्रावण मास के तीसरे सोमवार को हम एक ऐसे स्थान के बारे में बताएंगे जो अपने आप में एक विलक्षण प्राकृतिक सौंदर्य बिखेरे हुए है साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती के सती रूप का अलौकिक सौंदर्य देखने को मिलता है। अंचल के शिव भक्तों की इन दोनों मंदिरों में अपार श्रद्धा है और प्रत्येक पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। खासकर नवरात्रि के समय यह स्थान किसी देवभूमि से कम महसूस नहीं होता। हम बात कर रहे हैं ग्राम घुपसाल के भैरव बाबा मंदिर और प्रख्यात दंतेश्वरी मंदिर की।

बता दें बाबा पाटेश्वर मंदिर जो राजनांदगांव-डोंगरगांव से अंबागढ़ चौकी के रास्ते ग्राम घुपसाल पहुंचते ही रोड के बांयी ओर यह छोटा सा मंदिर स्थापित है। ग्राम घुपसाल के बस स्टैंड के समीप से ही मां दंतेश्वरी मंदिर का रास्ता साफ दिखाई पड़ता है। जिसके बाद अति प्राचीन शिवलिंग के दर्शन के लिए घुपसाल से कुछ दूर आगे बढऩे पर दैहान रोड में पहाड़ी पर जाने का रास्ता दिख जाता है। इन दोनों पहाडिय़ों में पहुंचने पर प्रकृति के सानिध्य और देवी देवताओं की शरण में अलौकिक आनंद की अनुभूति मन को तृप्त कर देती है।

यह है पहुंच मार्ग

रायपुर-चंद्रपुर स्टेट हाईवे में राजनांदगांव से अंबागढ़ चौकी के बीच पडऩे वाला छोटा सा गांव घुपसाल (कु) जिसकी दूरी राजनांदगांव जिला मुख्यालय से लगभग 48 किमी तथा डोगरगांव तहसील मुख्यालय से करीब 16 किमी है। ग्राम के बस स्टैंड के समीप ही मां दंतेश्वरी मंदिर का रास्ता दिखाई पड़ता है। यहां से मंदिर की दूरी करीब 400 मीटर है। वहीं ग्राम घुपसाल से दैहान रोड में करीब 2 किमी आगे बढऩे पर बांयी ओर झील दिखाई देता है तथा उसके सामने भैरव पहाड़ी का रास्ता दिखाई पड़ता है।

वनों की रानी और दुर्लभ वृक्षों की भरमार

इस संबंध में स्थानीय ग्रामीणों सहित वैद्य महेश गंजीर ने बताया कि इस रास्ते सहित देव भूमियों में औषधि तो है ही इसके साथ ही कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं जो समान्यत: अन्यत्र दिखाई नहीं देते। उन्होंने बताया कि देव धाम के पहुंच मार्ग में ही पाटेश्वर मंदिर के सामने पलास का वृक्ष है। इस वृक्ष के संबंध में ऐसा माना जाता है कि फाल्गुन मास में पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश में सबसे पहले पलास का फूल इसी वृक्ष में खिलते हैं। वहीं भैरव बाबा धाम के पहुंच मार्ग में सीढ़ी के रास्ते कुछ उपर चढऩे पर दाहिनी ओर वनों की रानी कहलाने वाला कुल्लू (छत्तीसगढ़ में) अमेरिकन मूल का वृक्ष भी मौजूद है, जो अलग ही दिखाई देता है। साथ ही एक ऐसा पौधा भी है जो हमेशा जोड़े में रहता है जिसे छत्तीसगढ़ में शिव-पार्वती के रूप में जाना जाता है, जो दो त्रिकोण पत्ती या कंद के रूप में होता है। मूलत: इसे बनराकस के पौधे के नाम से जाना जाता है। जिसका आदि काल से टीबी व कैंसर जैसे असाध्य रोगों के लिए उपयोग किया जाता रहा है। वहीं भगवान शिव धाम में जंगली प्याज का कंद भी मौजूद है जिसका गुण बेहद रहस्यमयी और गुणकारी है।

पुराने मंदिर का अवशेष

भैरव पहाड़ी में प्राचीन शिव ***** स्थापित है और पुराने मंदिर का अवशेष आज भी विद्यमान है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि इस पहाड़ी में कई वर्षों पहले एक सिद्ध बाबा जिन्हें भैरव बाबा के नाम से जाना जाता है और उन्हीं के नाम पर इस पहाड़ी का नामकरण किया गया है। वे यहां भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। वहीं जिस रूप में मंदिर था, उसके मूल स्वरूप को ग्रामीणों ने वैसा ही बनाए रखा है। यह एक खुली कुटिया के रूप में हैं जहां बाबा विराजमान थे। उस स्थान पर स्वान (कुत्ता) की प्रतिमा के साथ-साथ घोड़ा, त्रिशुल सहित एक सिद्ध बाबा की मूर्ति भी है।

पांच गांव के ग्रामीण करते हैं पहाड़ की देख-रेख

मंदिर से जुड़े सदस्य सहित स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार इस पहाड़ में प्राचीन मंदिर और एक बाबा का निवास स्थान है उसके संरक्षण संवर्धन में पांच गांव के ग्रामीण निरंतर लगे रहते हैं। मिली जानकारी के अनुसार वे इस पहाड़ी सहित पूरे क्षेत्र के विकास के लिए देख-रेख करते हैं। इनमें ग्राम दैहान, ठाकुरबांधा, नवाटोला, मुंजाल पाथरी तथा जोरातराई शामिल हैं। यहां के ग्रामीण बारी-बारी से तथा वन विभाग के सहयोग से देवधाम के देखभाल में लगे हैं।

मां दंतेश्वरी की यह है मान्यता

ऐसी मान्यता है कि मां दंतेश्वरी का मंदिर संतान प्राप्ति के लिए अंचल तथा पूरे क्षेत्र में प्रख्यात है। इसका प्रमाण कई दंपत्तियों ने दिया है। वहीं मंदिर में दोनो नवरात्र में भक्त ज्याति कलश प्रज्जवलित कराते हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष चमारराय साहू तथा भागीराम भुआर्य ने बताया कि देवी पुराण में सती के इक्यावन शक्ति पीठों का वर्णन है जबकि तंत्र चुणामणी के अनुसार बावनवां शक्ति पीठ दंतेश्वरी मां को बताया गया है, जो बस्तर के दंतेवाड़ा में विराजमान हैं। कहानी के अनुसार माता सती के दांत यहां गिरे थे जिसके अनुसार इसे दंतेश्वरी या रक्तदंतिका के नाम से जाना जाता है। मां दंतेश्वरी जो सात रूपों में प्रकट हुई थी। उनका सातवां रूप ग्राम घुपसाल में विराजमान है। उन्होंने बताया कि यहां की प्रामाणिकता का आभास भक्तों को हो जाता है, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। वहीं मंड़ई (मेला) में एक देवी का झूला भी काफी महत्व रखता है।

मां दंतेश्वरी का सातवां प्रतिरूप स्थापित है घुपसाल में

इस संबंध में और ज्यादा जानकारी देते हुए सेवानिवृत्त प्रधानपाठक उदलाराम ठाकुर ने बताया कि उन्होने भी मंदिर से जुड़ी जानकारियों का संकलन किया है। उन्होने बताया कि मां दंतेश्वरी का पहला स्वरूप बस्तर के दंतेवाड़ा में स्थापित है, जो सात बहनों के रूप में प्रकट हुई। उनका अन्य मंदिर विजयपुर, जुन्नापानी, माहुद, अंबागढ़ चौकी कान्हे, दनगढ़, छुरिया में स्थापित है वहीं उनकी छोटी बहन घुपसलहीन माता के रूप में घुपसाल में विराजमान हैं। यहां भक्त नवरात्रि में रात्रि विश्राम करते हैं और मनचाहा फल मांगते हैं। मां दंतेश्वरी मंदिर संतान प्राप्ति के उद्देश्य से भक्तों में खासा महत्व रखता है। इसी मान्यता के चलते यहां ज्योति कलश प्रज्जवलित कराया जाता है।

यहां है पर्यटन की अपार संभावनाएं

भैरव बाबा पहाड़ी में यहां दूर-दूर से लोग भगवान भोलेनाथ के दर्शन और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने आते हैं। वहां मौजूद क्रांति बसु वन समिति अध्यक्ष व लोक रंजनी के संचालक व एसएल खोब्रागढ़े प्राचार्य दाऊटोला ने बताया कि वे हमेशा यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं क्यों कि पहाड़ी के उपर बड़ा मैदानी इलाका है।

Nitin Dongre Desk
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