लैक्टोमीटर के भरोसे तंदुरुस्त हो रहे राजस्थान के विद्यार्थी

लैक्टोमीटर के भरोसे तंदुरुस्त हो रहे राजस्थान के विद्यार्थी
लैक्टोमीटर के भरोसे तंदुरुस्त हो रहे राजस्थान के विद्यार्थी

Aswani Pratap Singh | Updated: 10 Sep 2019, 06:26:39 PM (IST) Rajsamand, Rajsamand, Rajasthan, India

सवा साल से बिना गुणवत्ता और मिलावट की जांच के दूध पी रहे विद्यार्थी
-लैक्टोमीटर की परख पर उठे सवाल

अश्वनी प्रतापसिंह @ राजसमंद. प्रदेश के स्कूलों में अन्नपूर्णा दूध योजना के तहत विद्यार्थियों को दिए जाने वाले दूध की गुणवत्ता सवालों के घेरे में है। करीब सवा वर्ष से विद्यार्थियों को जो दूध पिलाया जा रहा है वह सिर्फ लैक्टोमीटर के भरोसे है। पत्रिका ने लैक्टोमीटर से हो रही जांच की हकीकत जानी तो चौकाने वाले तथ्य सामने आए। लैक्टोमीटर की जांच में रीडिंग गर्म पानी, नमक मिले दूध और चीनी मिले दूध में असीमित बढ़ गई। यानि दूध में पानी मिलाकर चीनी या नमक मिला दिया जाए तो भी लैक्टोमीटर उसे पूर्ण शुद्ध दूध ही बताएगा। पत्रिका ने इसका स्टिंग कर पूरी पड़ताल की।


जानिए लैक्टोमीटर का सच
राजस्थान पत्रिका ने लैक्टोमीटर द्वारा दूध की जांच किस हद तक शुद्ध होती है इसकी जांच के लिए एक डेयरी संचालक से सम्पर्क किया। संचालक ने गाय के दूध पर परीक्षण शुरू किया। जब सादे दूध पर लैक्टोमीटर डाला गया तो उसका एलआर 2 प्वाइंट चढ़ा। फिर संचालक ने उसी दूध में दो चुटकी नमक और पानी मिलाकर उसकी रीडिंग ली तो उसकी एलआर ढाई गुणा बढ़कर 5 तक पहुंच गई, मतलब लैक्टोमीटर ने मिलावटी दूध को सादे दूध की तुलना में ढाई गुणा अधिक शुद्ध बताया। इस दौरान संचालक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि दूध में चीनी, नमक, गर्मपानी, बकरी का दूध, ऊंटनी का दूध मिलाने से लैक्टोमीटर की एलआर काफी बढ़ जाती है। इसलिए हम दूध की जांच लैक्टोमीटर से नहीं करके फैट मशीन से करते हैं। संचालक ने बताया कि लैक्टोमीटर भी अलग-अलग तरह के होते हैं, डेयरी और मेडिकल स्टोर पर मिलने वाले लैक्टोमीटर के भी परिणाम अलग-अलग आते हैं।


स्कूलों में ऐसे हो रही जांच
प्रदेश के कई स्कूलों में डेरियों से तथा कइयों में सीधे ग्रामीणों के जरिए दूध सप्लाई होता है। ऐसे में स्कूलों में लैक्टोमीटर से दूध की जांच करने के आदेश है। शिक्षक दूध के सैम्पल में लैक्टोमीटर डालकर रीडिंग (एलआर) देखते हैं और उस आधार पर दूध को शुद्ध मानकर बच्चों को पिला देते हैं।


रजिस्टर्ट फर्म तक नहीं
छोटी से छोटी खाद्य सामग्री बेचने के लिए चिकित्सा एवं खाद्य विभाग द्वारा फर्म का रजिस्ट्रेशन आवश्यक होता है, जबकि बड़ी मात्रा में स्कूलों में जाने वाले दूध की न तो कोई जांच होती है और न ही इसकी कोई पुख्ता व्यवस्था है कि दूध रजिस्टर्ट फर्म से ही खरीदा जाए। सूत्रों ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों की आधे से ज्यादा स्कूलें ऐसी हैं, जहां पर बिल तो रजिस्टर्ट फर्म के बन रहे हैं, लेकिन दूध की सप्लाई स्थानीय स्तर पर हो रही है। इसकी कईबार शिकायतें भी हुई हैं लेकिन आजतक कोई जांच नहीं हुई।


पूर्व सरकार ने शुरू की योजना
राजस्थान में 2 जुलाई 2018 को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने विद्यालयों में विद्यार्थियों के ठहराव को सुनिश्चित करने के लिए कक्षा 1 से 5वीं तक के बच्चों को 150 ग्राम दूध तथा 6 से 8वीं तक के बच्चों को 200 ग्राम दूध पांतरे देना शुरू किया। बाद में सितम्बर माह में सरकार ने योजना के तहत बच्चों को रोजाना दूध देने के आदेश जारी कर दिए। केवल राजसमंद में ही रोजाना 15 लाख रुपए का दूध स्कूलों के लिए सप्लाई किया जाता है।


दूध पीने से बीमार हो गए थे 55 बच्चे
दूध योजना के शुरुआती दिनों में ही पुनावली माध्यमिक विद्यालय के 31 बच्चे दूध पीने से बीमार हो गए थे, बाद में उनका राजकीय आरके जिला चिकित्सालय में उपचार करवाया गया था। हालही में जोधपुर के बिलाड़ा में दूध पीने से १९ बच्चे बीमार हो गए थे। प्रदेश भर में लगातार बच्चों के बीमार होने की खबरें आती हैं।


योजना की समीक्षा तक नहीं
पिछले करीब सवा साल से रोजाना सरकार द्वारा १५ लाख रुपए का दूध विद्यार्थियों को वितरित किया जा रहा है। लेकिन दूध से विद्यार्थियों में क्या ग्रोथ आई, दूध योजना से कितना नामांकन बढ़ा, योजना के अन्य क्या फायदे हुए इसकी समीक्षा तक नहीं हुई।


लैक्टोमीटर से करवाते हैं जांच...
स्कूलों में जो दूध लिया जाता है उसकी लैक्टोमीटर से जांच की जाती है। बच्चों को दूध देने से पहले दूध प्रभारी उस दूध को चखकर देखता है, इसके बाद ही बच्चों को दिया जाता है।
-सोहनलाल रेगर, डीईओ (प्रारम्भिक), राजसमंद

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