राजसमंद झील पेटे में पेड़ काटने पर रोक

पत्रिका की लगातार मुहिम के बाद एसडीएम ने छह माह बाद जारी किया आदेश, राजस्व और वन विभाग सर्वे कर एक-एक पेड़ की करेगा गिनती, खेड़ा मगरा की तर्ज पर और भी जगह बोए जाएंगे पौधे

By: jitendra paliwal

Published: 22 Jul 2021, 11:53 AM IST

राजसमंद. प्रवासी पक्षियों और स्थानीय परिंदों के पसंदीदा ठिकाने खूबसूरत राजसमंद झील के पेटे में अब और पेड़ नहीं काटे जा सकेंगे। राजस्थान पत्रिका की लम्बी मुहिम के बाद आखिरकार 206 दिन बाद राजसमंद उपखण्ड अधिकारी ने बबूल सहित तमाम प्रजातियों के पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। यही नहीं, पूरे पेटे में सर्वे कर मौजूद पेड़ों की गिनती कर उनकी निशानदेही की जाएगी। ऐसा होने पर पेड़ भी सरकारी रिकॉर्ड में आ जाएंगे।

उपखण्ड अधिकारी सुशील कुमार ने इस सम्बंध में 20 जुलाई को आदेश जारी किया। इसमें बताया कि राजसमंद झील के रूण क्षेत्र के भाणा, भगवान्दा में स्थित पेटाकाश्त भूमि में लगे पेड़ों को काटने पर अब पूर्णतया प्रतिबंध रहेगा। केवल विलायती बबूल (जूली फ्लोरा) को काटने की छूट दी गई है। आदेश में प्रशासन ने स्वीकारा कि पेटाकाश्त में लगे पेड़ों की कटाई हुई है और यह उनकी जानकारी में आया है। प्रशासन ने वन विभाग, राजस्व विभाग, पंचायत राज विभाग से चर्चा कर यहां प्रवासी पक्षियों के संरक्षण एवं झील के पारस्थितिकीय तंत्र को मजबूत करने के लिए कुछ निर्णय लेने की जानकारी दी।

यह लिए निर्णय
- झील पेटे में केवल विलायती बबूल को छोड़कर अन्य पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध रहेगा। उल्लंघन करने पर कानूनी कार्यवाही होगी।
- झील पेटे में राजस्व व वन विभाग सर्वे कर पेड़ों की गणना तथा उनकी निशानदेही करेगा।
- राजसमंद झील की खेड़ा मगरी की तर्ज पर अन्य जगह भी भामाशाहों के सहयोग से सघन पौधरोपण कराया जाएगा।
- ग्राम लवाणा में वन विभ्ज्ञाग की ओर से पंचायत के सहयोग से राजस्थान ईको टूरिज्म पॉलिसी के मुताबिक सशुल्क बर्ड फेस्टिवल, नेचर ट्रेल आदि गतिविधियां आयोजित करने का प्रस्ताव है।
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केवल पत्रिका ने प्रमुखता से उठाया मुद्दा
राजसमंद झील में बड़े पैमाने पर अवैध मत्स्याखेट, पक्षियों का शिकार, अवैध तरीके से पेड़ काटकर बेचने, यहां के प्राकृतिक वातावरण, प्रवासी पक्षियों के रहवास को उत्पन्न खतरे और अवैध मानवीय गतिविधियां बढऩे को लेकर राजस्थान पत्रिका ने पिछले कई सालों में समय-समय पर मुद्दे उठाए। गत वर्ष दिसम्बर में पेड़ कटाई का मामला भी पत्रिका ने ही उजागर किया। इसके बाद लगातार समाचार मुहिम चलाई गई। प्रकृतिप्रेमी और भाणा-लवाणा और भगवान्दा गांव के लोग भी जागे और विरोध शुरू कर दिया। आखिरकार प्रशासन पेड़ों की कटाई पर रोक लगाकर पौधरोपण करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
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झील विकास के इस मॉडल पर ऐतराज
पेटे में पहले 50-100 साल पुराने पक्षियों के रहवास के अनुकूल बबूल के दर्जनों पेड़ काटने और बाद में छायादार पौधे लगाने को लेकर झील व पर्यावरणप्रेमियों की ओर से लगातार आपत्ति जताई जा रही है। हालांकि प्रशासन कहता रहा है कि पेड़ आसपास के कुछ ग्रामीणों ने काटे हैं। पिछले साल दिसम्बर में पेड़ों की कटाई तो रुक कई, लेकिन यहां पैराग्लाइडिंग और अन्य मानवीय गतिविधियां बढऩे तथा प्रस्तावित पर्यटन विकास की योजनाओं को लेकर पर्यावरण के जानकार लगातार चिंताएं जता रहे हैं।

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