पुरुषवादी मानसिकता से बाहर आए बिना सशक्तीकरण संभव नहीं

पत्रिका स्थापना दिवस विशेष - बदलाव की नायिकाएं-

- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष



By: Rakesh Gandhi

Published: 07 Mar 2020, 08:08 PM IST

राकेश गांधी
राजसमंद. जब तक महिलाएं स्वयं अपने विकास के लिए आगे नहीं आएंगी, तब तक उनका विकास कठिन है। ऐसा अक्सर कहा जाता रहा है कि किसी भी देश की सांस्कृतिक विरासत का पता वहां की महिलाओं की अवस्था से चलता है। इस युग में काफी हद तक महिला सशक्त हुई है, पर अभी भी काफी गुंजाइश है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की दशा सुधारने पर अभी काफी काम करना होगा। आज भी वे वहां अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। महिलाएं सरपंच भी बनी हैं, लेकिन काम अभी भी उनके पति देखते हैं। यानि पुरुषवादी मानसिकता की शिकार अभी भी हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राजस्थान पत्रिका ने राजसमंद की प्रबुद्ध महिलाओं से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उनके मौलिक विचार-


हमारा हर दिन महिला दिवस हो
महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है कि वह शिक्षित हो और अपने पैरों पर खड़ी हो। इसके अलावा विशेष बात ये भी है कि महिला अपने नैसर्गिक गुणों को कभी न भूले। संवेदनशीलता, दया, प्रेम, करूणा व शक्ति। इन्हीं गुणों की बदौलत अपने परिवार को साथ लेकर चलने का सामथ्र्य एक महिला में ही हो सकता है। मेरा तो ये नारा है, 'हर नारी का है ये नारा, मजबूत हो भारत हमारा।Ó
हमें अपनी बेटियों को पढ़ाना होगा, उन्हें सम्मान देना होगा, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही उन्हें सशक्त बनाना होगा। महिलाओं को चाहिए कि वे अन्य महिलाओं को सहयोग करे, ताकि मिलकर आगे बढ़ा जा सके और उनमें आत्मविश्वास बढ़ाया जा सके।
- किरण माहेश्वरी, विधायक


संस्कारों की जमीन को भी न भूलें
महिलाओं को समाज में उचित सम्मान, सुरक्षा एवं स्वयं के निर्णयों के लिए स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। आज जरूरत महिलाओं को अपनी क्षमताओं और महत्व को पहचानने की है। बदलते परिवेश में महिलाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। स्नेह एवं प्रेम की डोर से परिवार को बांधने वाली स्त्री स्वयं भी कहीं अपनी शक्तियों से अनजान लगने लगी है।
एक महिला होने के नाते मुझे लगता है कि महिला का सम्मान सिर्फ महिला होने के कारण ही न हो, बल्कि उसकी काबिलियत को पहचान मिलनी चाहिए। अपनी रचनात्मकता एवं सृजन की असीम शक्ति के जरिए एक महिला विषम परिस्थितियों में भी विजयी हो सकती है। रूढि़वादी व पुरातन परम्पराओं के नाम पर खुद को उडऩे से न रोकें, साथ ही फैशन परस्ती एवं पाश्चात्य प्रभाव से अपने संस्कारों की जमीन को भी न भूलें।
- डा. सुमन बड़ोला

जब जब अवसर मिले, उपलब्धियां हासिल की है
'गर मंजिल तक है पहुंचना, फिर तमस से क्या डरना, तोड़कर तामसिकता की दीवारों को, अब नए सफर पर है निकलना। 'उक्ति को चरितार्थ करते हुए नारी संबंधी तथा कथित 'कोमल', 'कमजोर', 'अबला' जैसे मिथकों को तोड़कर प्राचीन काल से अद्यतन तक प्रतिकूल परिस्थितियों से लोहा लेते हुए एक ओर बेटी, बहन, पत्नी, मां बनकर पारिवारिक सामाजिक कर्तव्यों को बखूबी निभाया है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए रास्ते, नई मंजिलें, नए कीर्तिमान बनाए हैं।
जब जब महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समान अधिकार प्राप्त हुए हैं, नारी ने हमेशा शिक्षा, साहित्य, समाज, खेल, कानून व्यवस्था, राजनीति, सुरक्षा, अंतरिक्ष विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों में उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल करते हुए नारी शक्ति के वजूद का अहसास सम्पूर्ण विश्व को कराया है।
एक कड़वा सच यह भी है कि आज भी लिंगभेद, अशिक्षा, शारीरिक व मानसिक उत्पीडऩ, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा जैसी समस्याएं नारी शक्ति के विकास में रोड़ा बनी हुई है। आज एक नई पहल करते हुए 'औरत ही औरत की शत्रु होती हैÓ, 'तुम लड़की हो अपनी मर्यादा में रहोÓ जैसे जुमलों को तोड़कर महिलाओं को प्रेम, सम्मान तथा समाज में बराबरी का हक देना चाहिए, जिसकी वह हकदार है। तभी समाज और राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- चावली चौधरी

आत्मकेन्द्रित होकर चिन्तन करना होगा
एक जागृत महिला न केवल अपने जीवन को विकसित करती है, बल्कि अपने समूचे परिवार का पालन पोषण और उसे संस्कारित भी करती है। शिक्षा की कमी व संस्कारों की रूढ़ता से अंधविश्वास पनपते हैं। ऐसे में महिलाओं को यदि अपनी अस्मिता बनाकर रखना है तो स्वतंत्र चिंतन की क्षमता अर्जित करनी होगी। इससे ही महिला शक्ति का समुचित उपयोग संभव होगा।
विगत दशक से बड़े- बड़े शहरों में नारी जागृति के स्वर काफी तीव्रता से सुनाई दे रहे हैं। शिक्षित एवं प्रबुद्ध महिलाएं सार्वजनिक रूप से क्रांति की आवाज उठा रही है, क्योंकि वे जज, वकील, डॉक्टर, लेखक, कलाकार या राजनेता हैं, लेकिन जागृति के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। वाकई किसी लक्ष्य को प्राप्त करना है तो महिला को आत्मकेन्द्रित होकर चिन्तन करना होगा।
महिलाओं की बौद्धिक क्षमताओं का विकास उनके शैक्षिक विकास के साथ जुड़ा है। शिक्षा ही महिलाओं के बौद्धिक चेतना के दरवाजों को खोल सकती है। आज नारी घर से बाहर निकल कर हर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचाने बनाने लगी है। साथ ही सक्षम बनकर अपने घर व कार्यक्षेत्र की हर जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वहन करने लगी है।
- डा. सीमा कावडिय़ा


सशक्तीकरण का दुरुपयोग भी न हो
सदियों से शोषित रही महिलाओं ने सशक्तीकरण से अपनी योग्यता व क्षमता अनुसार हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। आज महिलाओं को खुद से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता मिली। आर्थिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्रता मिलना अच्छी बात है। महिलाओं को भी चाहिए कि परिवार में सामंजस्य, सौहाद्र्र व सद्भाव बनाए रखते हुए पुरुष समाज के साथ समानधर्मी शक्ति बन आगे बढ़े।
आजकल कहीं- कहीं इस महिला सशक्तीकरण का अलग रूप भी देखने में आ रहा है। परिवार में सामंजस्य न होना, विवाह विच्छेद, बड़े बुजुर्गों का अपमान आदि मुद्दों ने परिवार में अशांति का कारण बना दिया है। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक नारी होने के नाते मेरा मानना यही है कि हम महिलाओं को अपने सशक्तीकरण का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। आज समाज एक सशक्त महिला के व्यापक स्वरूप देखने की अपेक्षा रखता है।
- वीणा वैष्णव

अपनी शक्ति के पहचानें
आज महिलाओं को समाजिक व अर्थिक दायित्वों के प्रति जिम्मेदार बनना ही होगा। अबला को सबला बनना होगा, क्योंकि वे ताकत व सामथ्र्य में कही आगे होती है। चंद महिलाओं के हाथों नेतृत्व होना भी असुरक्षा की भावना घर करती है। इसलिए महिलाओं के हितों के लिए उठने वाली आवाज स्वहित में निहित होकर दब जाती है।
महिला अभी भी बड़े अत्याचारों में हस्तक्षेप करने में सक्षम नहीं हैं। अर्थिक सक्षमता के साथ समाजिक व राजनीतिक सक्षमता को भी बढ़ाना होगा। नारी को उपभोग का संसाधन न बनकर समानता की लड़ाई लडऩे का वक्त है। एक दशक से महिला आरक्षण की बात आज तक किसी नेतृत्व ने नहीं उठाई, अब हमें इस आवाज़ को ऊंचा उठाना होगा। आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक समानता स्वतंत्रता पर बल देना होगा।
हमें ये मानना चाहिए कि महिलाओं के बिना देश का चहुंमुखी विकास संभव नहीं है। महिला दिवस की आवाज एक दिवसीय आवाज बनाकर नहीं रखना है। इसे आगे भी बुलन्द रखना होगा। तभी देश मे अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता होगी।
- संगीत माहेश्वरी


अपनी निजी स्वतन्त्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिए महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तीकरण है। परिवार और समाज की हदों को पीछे छोडऩे के द्वारा फैसले, अधिकार, विचार, दिमाग आदि सभी पहलुओं से मलिाओं को अधिकार देना उन्हें स्वतंन्त्र बनाने लिए है। समाज में सभी क्षेत्रों में पुरूष और महिला दोनों के लिए समानता लाना जरूरी है। महिलाओं को स्वच्छ और उपयुक्त वातावरण की जरूरत है, जिससे कि वो हर क्षेत्र में अपना खुद का फैसला ले सकें, चाहे वो स्वयं, देश, परिवार या समाज किसी के लिए भी हो। आज 8 मार्च महिला दिवस ही नहीं, यह वास्वविक रूप से शक्ति दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए।
- डा. बृजलता चौधरी


वर्तमान दौर में नारी ने रूढिग़त शृंखलाओं को तोड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की है। अब वह असहाय व निरीह अबला मात्र नहीं रह गई। उसने अपनी स्वाभाविक वृत्तियों का सहज विकास करते हुए पुरुषों की सहचरी, सहकर्मी बनने का लक्ष्य लगभग पूरा किया है। अब वह रीतिकाल की अभिसारिका कामिनी या वासक सज्जा नारी नहीं है, बल्कि एक आदर्श मानवी के रूप में प्रतिष्ठित है।
आज विविध संघर्षों के बाद वह उस भाव धरा पर पहुंची है, जहां उसकी आंतरिक अकुलाहट में शांति स्थापित करने में समर्थ हो पाई है। उलझे हुए विचारों में सामंजस्य बना पाई है। आज जीवन के हर क्षेत्र में उसने अपना स्थान बनाया है, लेकिन एक प्रश्न फिर भी ज्वलंत है कि क्या नारी जगत ने अपना वह स्थान प्राप्त कर लिया है, जिसकी वह अधिकारिणी है? क्या नारियों पर अत्याचार कम हो गए? ऐसे अनसुलझे सवाल हैं जिनके जवाब शायद ही कोई दे पाए।
- लक्ष्मी जैन

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