scriptIf you get the wages, then if you don't get the job then 'Rosa'. | International Workers Day : मजदूरी मिल गई तो रोजी नहीं तो 'रोजा' | Patrika News

International Workers Day : मजदूरी मिल गई तो रोजी नहीं तो 'रोजा'

- मुखर्जी चौराहा पर लगती मजदूरों की मंडी, कई गांवों से आते मजदूर, एक महिने में बामुश्किल मिलता है 15-20 रोजगार, स्थिति खराब, अंतरराष्ट्र्रीय मजदूर दिवस आज

राजसमंद

Updated: May 01, 2022 11:19:52 am

हिमांशु धवल@ राजसमंद. मनरेगा में मजदूरी कम मिलती है तो किसी के पास खेत तो हैं लेकिन पानी नहीं होने के कारण खाली पड़े हैं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के चलते कई किलोमीटर दूर से लोग मजदूरी की आस में प्रतिदिन शहर के मुखर्जी चौराहे पर कई लोग आते हैं। यहां घंटों मशक्कत करने के बावजूद महिने में बामुश्किल 15-20 दिन काम मिलता है। ऐसे में कई मजदूरों को काम नहीं मिलने पर निराश लौटना पड़ता है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि मिल गई तो रोजी नहीं रोजा।
शहर के मुखर्जी चौराहा पर प्रतिदिन मजदूरों की मंडी लगती है। यहां पर आस-पास के गांवों के महिला और पुरुष काम की तलाश में आते हैं। चौराहे पर मोटरसाइकिल अथवा कार के ठहरते ही वहां मौजूद मजदूर वाहन चालक के ईद-गिर्द खड़े हो जाते हैं। वह शख्स इन्हें काम के बारे में बताता है और मजदूर अपनी मजदूरी बताते हैं। यह क्रम सुबह 8 से 10 बजे तक चलता है। यहां पर मजदूरों को करीब 350-400 रुपए और कारीगर के 700-800 रुपए मिलते हैं। सर्वाधिक चूना-पत्थर का काम करने वाले मजदूर होते हैं। महंगाई और बेरोजगारी के कारण मजूदरों की संख्या में इजाफा होने के कारण यहां भी अब काम की मारा-मारी होने लग गई है। इसका नतीजा है कि एक मजदूर को महिने में बामुश्किल 15-20 दिन रोजगार मिल पाता है। ऐसे में शेष मजदूरों के मायूस होकर घर लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है। नियमित मजदूरी नहीं मिलने के कारण घर-परिवार का लालन-पालन करने में भी परेशानी होती है। राजस्थान पत्रिका की टीम ने एक मई को अंतरराष्ट्र्रीय मजदूर दिवस के अवसर मजदूरों से बातचीत कर जाने हाल।

International Workers Day : मजदूरी मिल गई तो रोजी नहीं तो 'रोजा'
 राजसमंद के मुखर्जी चौराहे पर खड़े मजदूर
15-20 दिन मिलता बामुश्किल काम
पिछले कुछ समय से मजदूरों की संख्या बढ़ गई है। इसके कारण बामुश्किल एक मजदूर को 15-20 दिन बामुश्किल काम मिलता है। मैं प्रतिदिन अमरतलाई से आता हूं। वहां से आने-जाने में ही 40 रुपए किराया लगता है। मजदूरी के अलावा कोई काम नहीं कर सकते हैं।
- जीवा बंजारा, अमरतलाई
किराए चुकाना तक होता मुश्किल
सरदारगढ़ की रहने वाली हूं। मजदूरी के लिए जोडलिया में किराए का कमरा लेकर रहते हैं। खेती-बाड़ी नहीं है। मनरेगा में जाने पर मजदूरी कम मिलती है। इसके कारण यहां पर काम की तलाश में आते हैं। मुश्किल से घर का गुजारा चलता है। स्थिति बहुत खराब है।
- साबूदेवी, जोडलिया
पेंशन भी नहीं मिलती, मजदूरी से चलता घर
पति और पत्नी दोनों अकेले रहते हैं। बच्चे अलग रहते हैं। हमें तो वृद्धाअवस्था पेंशन भी नहीं मिलती है। यहां मजदूरी के लिए रोज आते हैं। कभी काम मिलता है तो कभी खाली हाथ लौटना पड़ता है। मजदूरी से ही हमारे घर का खर्च चलता है।
- डालू कालबेलिया, हाउसिंग बोर्ड
एक बेटा मंदबुद्धि, पति-पत्नी दोनों काम करते
एक बेटा मंदबुद्धि होने के कारण अजमेर में पढ़ता है। पति-पत्नी दोनों मजदूरी के लिए आते हैं। जमीन है, लेकिन पानी नहीं होने के कारण खेती भी नहीं कर सकते हैं। मनरेगा में मजदूरी कम मिलती है। महंगाई के कारण स्थिति खराब होती जा रही है। पहले यह अकेले आते थे, अब दोनों काम के लिए आते हैं।
- बरदी बाई, बाबूलाल, मोराना
यहां से आते हैं सवार्धिक लोग
शहर के हाउसिंग बोर्ड सहित कुंवारिया, एमडी, राजियावास, मोही, महासतियों की मदड़ी, भावा, भाणा, तासोल, पहुंस पीपाड़ा, हाउसिंग बोर्ड, मोरना और जोड़लिया सहित आस-पास के गांवों से लोग यहां मजदूरी के लिए आते हैं।


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