इजाजत मिलते ही छलनी होने लगा धरती का सीना

राजसमंद जिले में ट्यूबवैल खोदने की मशीनें रात-दिन धड़धड़ा रहीं, कृषि, निजी और उद्योगों के लिए सीमित इस्तेमाल की राज्य सरकार ने दी है एनओसी से छूट, भूजल पुनर्भरण की कोई पाबंदी नहीं होने से भविष्य में जलसंकट का खतरा

By: jitendra paliwal

Published: 13 Jan 2021, 09:57 AM IST

केस-1
राजसमंद में उदयपुर-गोमती हाइवे पर आरटीओ ऑफिस के पास गत 9 जनवरी की शाम एक मशीन से ट्यूबवेल की खुदाई धड़ाधड़ चल रही थी। यहां से खेती की जमीन दूर है, जबकि पास ही में एक होटल स्थित है।

केस-2
जिले के खमनोर कस्बे में पिछले दस दिन में सात अलग-अलग जगहों पर बोरवेल की खुदाई हुई है। कस्बे में ग्राम पंचायत इसकी खुदाई से इनकार कर रही है, लेकिन अंधाधुंध मशीनें चलने से पर्यावरणविदें में चिंता है।

केस-3
पानी के लिए तरसते रहे भीम-देवगढ़ क्षेत्र में भी धड़ल्ले से ट्यूबवैल खुदने लगे हैं। पहले से इस इलाके में भूजल काफी नीचे रहा है, लेकिन सरकार की रोक हटने के बाद अवैध इस्तेमाल की आशंका बढ़ गई है

राजसमंद. पिछले 20 साल में भूजल के लिहाज से अधिकांश वक्त डार्क जोन में रहे राजसमंद जिले में सरकार की नई अनुमति ने धरती का सीना चीरने का लाइसेंस ही दे दिया है। राज्य सरकार ने कृषि सहित छह श्रेणियों में जब से एनओसी लेने की बाध्यता को समाप्त किया है, तब से ट्ूयूबवेल-बोरवेल की खुदाई के मामलों की अचानक बाढ़ सी आ गई है। गांव, कस्बे और शहरों में धड़ल्ले से भूमि को छलनी किया जा रहा है।

पत्रिका टीम ने पड़ताल की तो सामने आया कि जिले के केवल कस्बाई इलाकों में ही 150 से ज्यादा ट्यूबवेल खोदे जा चुके हैं। यह सिलसिला अब भी लगातार जारी है। हर दिन कहीं न कहीं ट्यूबवेल खोदने की मशीनें पहुंच रही हैं।

अब कोई पूछ भी नहीं रहा
सरकार ने जिन श्रेणियों के लिए ट्यूबवैल खुदाई के लिए छूट दी है, वे उस श्रेणी में आती हैं या नहीं, इसकी मौके पर जाकर अब कोई अधिकारी जांच भी नहीं कर रहा है। सरकार ने छूट तो दे दी, लेकिन अवैध रूप से ट्यूबवेल खोदने को लेकर निगरानी का कोई तंत्र काम नहीं कर रहा है। ऐसे में बड़े पैमाने पर भूजल के वैध-अवैध दोहन की स्थिति खड़ी होती जा रही है।

इन पांच श्रेणियों को मिली है छूट
1. पेयजल व घरेलू उपयोग के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वैयक्तिक घरेलू उपभोक्ता के लिए
2. ग्रामीण पेयजल आपूर्ति योजनाओं के लिए
3. सशस्त्र बलों के प्रतिष्ठानों के लिए
4. कृषि कार्यकलापों के लिए
5. 10 घन मी. (10 हजार लीटर) प्रतिदिन से कम भू-जल निकासी वाले सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के उपयोग के लिए भू-जल निकासी को एनओसी नहीं लेनी होगी।

राजसमंद रहा है डार्क जोन में
किसानों को अब डार्क जोन में ट्यूबवेल, कुएं खोदने के लिए अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी। प्रदेश में 2011 में यह नियम बनाया गया था कि बिना अनुमति ट्यूबवेल और कुएं नहीं खोदे जा सकेंगे। राजसमंद जिला राज्य में सबसे कम भूजल स्तर होने की वजह से डार्क जोन में रहा है।

कृषि कार्य से ज्यादा दूसरे कामों में
वर्तमान में अंधाधुंध ट्यूबवैल खोदने के चल रहे सिलसिले में कृषि कार्य से कम, वाणिज्यिक और गैर कृषि कार्य के लिए उपयोग का प्रयोजन अधिक देखा जा रहा है। निजी उपयोग के नाम पर कुछ लोग वाणिज्यिक कार्यों के लिए भी जमीन खोद रहे हैं।

फैक्ट फाइल
290 ब्लॉक डार्क जोन हैं इस समय राजस्थान में, जो पहले 36 ब्लॉक में
की स्थिति थी
2500 हैण्डपम्प उदयपुर सम्भाग में मृत पड़े हैं, जो पहले से भूजल स्तर गिरने का संकेत कर रहे हैं
38 प्रतिशत सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट ही पूरी क्षमता से काम रह रहे हैं
62 प्रतिशत काम नहीं करने से आसपास के ट्यूबवेल खुदने से सिवरेज इनमें प्रवाहित होने का खतरा बना रहेगा
1000 स्क्वायर मीटर एरिया से एक ट्यूबवेल पानी खींचता है

और भी हैं खतरे
- खराब पानी के जरिये सेहत खराब हो सकती है
- पानी कम होने से धरती की प्लेट्स खिसकने से असंतुलन से भूकम्प की आशंकाएं बढ़ेंगी।
- नदियां कुछ समय तक जो चलती हैं, वो जल्दी सूखने लगेंगी
- उद्योगों का अपशिष्ट खोदे गए ट्यूबवेल में जाने से भूजल जहर की तरह बनने का खतरा रहेगा
- अपशिष्ट की डम्पिंग के लिए भी ट्यूबवेल का दुरुपयोग होगा, जिसकी मॉनिटरिंग नहीं की जाती है
- जमीन के अन्दर खराब हुए पानी को शुद्ध करना असम्भव है

एक्सपर्ट व्यू
अभी तक तो जलस्रोतों की गणना हमारे नियंत्रण में थी। अब चूंकि हर व्यक्ति को इजाजत है तो इसका अनुमान लगाना ही मुश्किल होगा कि कितनी ट्यूबवैल खोदी जा चुकी है और कितना पानी निकाला जा रहा है। अनियंत्रित दोहन होने वाला है। भूजल कितना कम हुआ है, इसका सही अनुमान लगाना मुश्किल होगा। हरियाणा, कर्नाटक व राजस्थान को अमरीकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी (नासा) ने भी भूजल स्तर के लिहाज से खतरनाक पैमान पर माना है। तीनों राज्यों में भी राजस्थान की स्थिति बेहद खतरनाक है। भूजल दोहन को इतनी आजादी देना आगामी समय के लिए अत्यंत घातक होगा। भूजल तो कम होगा ही, पानी के लाभदायक लवण भी हानिकाकर हो जाएंगे। फ्लोराइड एक सीमा तक शरीर के लिए लाभदायक है, लेकिन उसकी मात्रा 1.5 पीपीएम से ज्यादा होने पर मानव शरीर के लिए अत्यंत घातक होगा। राजस्थान में आज भी फ्लोराइड, लेड, आर्सेनिक, नाइट्रेट्स, केडमियमयुक्त पानी की समस्या गम्भीर है। जलजनित बीमारियों को बढ़ावा मिलेगा, जो लाइलाज हैं। लोग मानते हैं कि तालाब, नदी या झील पूरी भरने पर भूजल बढ़ेगा, यह पूरी तरह सच नहीं है। किसी भी भूजल स्रोत का पंजीयन होना आवश्यक किया जाना चाहिए।
डॉ. पी.सी. जैन, एक्टसपर्ट, भूजल संरक्षण

jitendra paliwal
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned