Video : कमाई तो छोड़ो, इस बार ब्याज चुकाना भी पड़ेगा भारी

- रखी रह गई गणेश की बड़ी प्रतिमाएं
- गत वर्ष की बनाई हुई भी नहीं गईं

By: Rakesh Gandhi

Updated: 23 Aug 2020, 11:22 AM IST

राजसमंद. लक्ष्मण, कालूराम हो या फिर दौलत। इस बार जितने भी मूर्तिकारों ने गणेश प्रतिमाएं बनाई या पिछली बार की बनी मूर्तियां गणेश चतुर्थी पर बेचने को लाए, कोरोना ने सभी को निराश ही किया। यहां तक कि अभी तो पिछली बार का कर्ज ही नहीं चुक रहा। जो जगह यहां मूर्तियों को रखने के लिए ले रखी थी, उसका किराया भी चुकाना भारी पड़ रहा है। ये जरूर है कि इस बार छोटी प्रतिमाएं घरों में ज्यादा स्थापित की जा रही है, जिससे उनकी बिक्री कई गुना बढ़ गई। इससे इन मूर्तिकारों को काफी राहत मिली है। हालांकि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इस बार बड़ी मूर्तियां गई हैं।
हमेशा की तरह इस बार भी जिला मुख्यालय पर राजनगर व भीलवाड़ा मार्ग पर जिले के विभिन्न गांवों के मूर्ति बनाने वालों ने पूरी उम्मीद से दुकानें खोली। कुछ मूर्तिकारों ने दो-तीन माह पूर्व कर्ज लेकर नई बड़ी गणेश प्रतिमाएं बना ली तो कुछ ने पुरानी बनीं हुई मूर्तियों पर फिर से काम कर उन्हें तैयार किया। उस समय उन्हें पूरी उम्मीद थी कि गणेश चतुर्थी तक कोरोना जरूर खत्म हो जाएगा और उन्हें इन मूतिर्यों से कर्ज उतारने व अपने परिवार के पालन पोषण जितना पैसा मिल जाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ। गणेश चतुर्थी को ही सवेरे जब राजस्थान पत्रिका संवाददाता इन तीन-चार स्थानों पर पहुंचा तो वहां अधिकतर मूर्तियां रखी मिली। जो हर साल गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले तक चली जाती थी। एक जगह तो मूतियां बेचने वाली महिला इस संवाददाता से लडऩे पर उतर आई। न तो अपने परिवार के किसी आदमी को बातचीत करने दी व न ही उन्होंने फोटो लेने दिया। उन्हें डर था कि कहीं प्रशासन कोई कार्रवाई न कर दे। और जो बची हुई मूर्तियां हैं, वे जब्त न कर ली जाए।

इस बार तो संकट हो जाएगा बाबूजी
पीपली आचार्यान निवासी लक्ष्मण के पास ग्रामीण क्षेत्रों से कुछ लोग बड़ी मूर्ति लेने वाले आए थे, तो बहुत खुशी से उन्हें मूर्ति देने में लगा था। अंत में गाड़ी में मूर्ति चढ़वा कर उसने बात की तो उसकी आंखें भर आई। वो बोला, ब्याज पर पैसा ले रखा है। कमाई तो छोड़ो, ब्याज चुकाना भारी पड़ेगा। ये जगह ले रखी है, उसका किराया भी देना है। दो बार मालिक चक्कर लगा गया। हर बार 75-80 बड़ी मूर्तियां लग जाती थी, इतना कमा लेते थे कि साल भर निकल जाता था। लेकिन, इस बार तो कोरोना ने कहर ढा दिया बाबूजी। मेरा पूरा परिवार लगा है। 500 रुपए रोज में कारीगर भी लगाए, पर सब बेकार। इस बार पांच-छह मूर्तियां बड़ी मुश्किल से गई हैं। बाकी पैक कर रखनी होगी। ये बिक जाती तो सहारा मिल जाता।

एक भी बड़ी मूर्ति नहीं गई
भीलवाड़ा मार्ग पर दुकान सजा कर बैठे कालूराम ने कहा कि इस बार तो एक भी बड़ी मूर्ति नहीं गई। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि छोटी मूर्तियां गत बार से कई गुना अधिक बिकी है। हमने छोटी मूर्तियां भी खूब बनाई। लेकिन उससे उतनी आय नहीं होती। हां, ये जरूर अच्छा लगा जब छोटे बच्चे अपने हाथों में छोटे-छोटे गणेश लेकर जाते दिखाई दिए। भावना बड़ी प्रबल दिखाई दी। कोई नहीं, कमाई अगली बार कर लेंगे। कोरोना है साहब, स्वस्थ हैं, ये क्या कम है।

पिछली बार भी एक संकट हुआ था
ये मूर्तियां पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से बनाई जा रही है, जिसका कगाा माल बीकानेर से आता है। गत वर्ष तालाबों में इन मूर्तियों के विसर्जन को लेकर काफी विरोध हुआ। जल प्रदूषण को देखते हुए ये विरोध सही भी है। उस समय भी इन्हें मिट्टी से मूर्तियां बनाने का आग्रह किया गया। इन मूर्तिकारों ने कहा कि इसी वजह से पिछली बार भी काफी माल बच गया था। मिट्टी से बनी मूर्तियां मजबूत नहीं होती और एक मूर्ति बनाने में महिनों लग जाते हैं। ऐसे में हमारे लिए ये काफी कठिन है। कुछ दूसरा विकल्प देखना होगा।

Rakesh Gandhi
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned