Video : लोक शिक्षण की गंगोत्री श्रीवल्लभाचार्य

संदर्भ - श्रीवल्लभाचार्य जयंती आज

By: Rakesh Gandhi

Updated: 18 Apr 2020, 01:48 PM IST

- डा. राकेश तैलंग
आज महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती है। दार्शनिक धरातल पर शुद्धाद्वैत और भक्ति क्षेत्र में पुष्टि या भगवद् नुग्रह मार्ग श्रीवल्लभाचार्य की वृहत्तर देश कहीं जा सकती है। दाक्षिणात्य आध्यात्मिक चिंतन को उत्तर भारत में श्रीकृष्ण भक्ति आन्दोलन की मौलिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत कर इन महामना ने मनुष्य जीवन के दैनंदिन कार्यों के निष्पादन के बीच प्रभु भक्ति की ओर मार्गांतरित करने का जो कार्य किया, वह आज भक्तिमार्ग में सबसे अधिक सरल और समस्त प्रेय व श्रेय मार्गों का मार्ग दर्शन करता है।
चिंतन का विषय है कि वल्लभाचार्य और उनकी परवर्ती परम्परा के जनहितकारी पक्षों को हम अपनी वर्तमान पीढ़ी के लिए कितना उपयोग कर पाए? भारतवर्ष के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व धार्मिक जगत में जिन महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पृथ्वी प्रदक्षिणा के द्वारा सर्व स्वीकार्य ऋजु, सामयिक, वैदिक व लोक चेतना से सम्पृक्त दार्शनिक परम्परा को मानवीय आकांक्षा के विशाल केनवास पर उकेर कर प्रस्तुत किया और जिसे पुष्टि सेवा के त्रिआयामी रंगों से भरकर गुंसाई वि_लनाथ ने वैष्णव जगत् को प्रस्तुत किया, वह अपने ही शक्ति केन्द्रों पर बौद्धिक वर्ग व जिज्ञासुओं के लिए इस परम्परा के प्रति अनभिज्ञता और अरुचि के अंधेरों में जीने को अभिशप्त है।
हम जो इस व्यवस्था के केयर टेकर हैं, धर्म, राज व लोकतंत्र के नुमाइंदे, हमने अपने विशाल सामाजिक, बौद्धिक व आर्थिक स्रोतों के उपयोग व प्रबंधन के लिए समावेशी विकास की कितनी कोशिशों को आकार दिया? शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग के आधिकारिक प्रवक्ताओं, भाष्यकारों, विद्यार्थियों की इन प्रतिनिधि तीर्थों में लगभग अकाल की स्थिति देख इस प्रसंग में आज यह विचारणीय प्रश्न है। बिना इस विशाल व गहन परम्परा के शिक्षण और परिणाम स्वरूप तैयार विविध कौशलों में पारंगत पीढ़ी को उनका उचित योग क्षेम किए हम इस विरासत को संरक्षित भी रख पाएंगे, यह आज के इन क्षेत्रों के धार्मिक, राजकीय व लोक नेतृत्व को समझने की जरूरत है।
महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती पर यह अवबोध होना आवश्यक है कि हमारे ये मंदिर, जिन्हें हम हवेलियां भी कहते गौरवान्वित होते हैं, मात्र अष्टयाम दर्शनों से लाभान्वित हो मनोरथ, उत्सव सिद्धि के आनंद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस महान परम्परा को समझ इसके प्रकाश से समस्त प्रबुद्ध जगत को लाभान्वित करने के अकादमिक केन्द्र हैं। 'क्या हम वल्लभ दर्शन की गंगोत्री को इस संदर्भ में युवा पीढ़ी तक पहुंचा पा रहे हैं? सुधी जन विचार करे।'

Rakesh Gandhi Editorial Incharge
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