डेढ़ दशक से कागजों में धूल फांक रही वनौषधि उद्यान की योजना

- प्रदेश में 17 वनौषधि उद्यान किए जाने हैं विकसित

राकेश गांधी
राजसमंद. प्रदेश के 12 जिलों में 17 वनौषधि उद्यान विकसित करने की योजना पछले डेढ़ दशक से कागजों में फंसी पड़ी है। वर्ष 2005-06 में बनाई गई इस योजना के तहत विभिन्न जिलों में वहां की जलवायु के अनुरूप औषधियां उपजाई जानी थी। हालांकि पिछले कुछ समय से इस संंबंध में सक्रियता दिखने लगी है। संबंधित जिलों के कलक्टर को इन वनौषधि उद्यानों के लिए नरेगा के तहत कुछ काम करवाने को पत्र भेजे गए हैं।
इस योजना के तहत राजसमंद जिले में भी तीन जगह वनौषधि उद्यान विकसित किया जाना है। पिछले लम्बे समय से इस संबंध में पत्राचार जरूर हो रहा है, पर इस योजना के कागजों से धूल नहीं छंट रही। ऐसे में इन उद्यानों के जरिए औषधियां उपजाने सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अन्य जिलों की तरह यहां भी देवगढ़ तहसील के टोकरा गांव में 208.5 बीघा व आमेट तहसील के बीकावास गांव में 80 बीघा भूभाग इन वनौषधि उद्यानों के लिए आवंटित किया गया। इसके अलावा गुड़ली में भी प्रस्तावित था, लेकिन वहां की जमीन को लेकर प्रकरण विचाराधीन है।
सरकार की ये योजना इस मायने में काफी अच्छी है कि इस भूमि पर वनौषधि उगाकर प्रदेश की पांच रसायन शालाओं के उपयोग के साथ ही अधिक उत्पादन होने पर ये औषधियां अन्य आयुर्वेद दवाइयां बनाने वाली कम्पनियों को बेची जा सकेगी। इससे प्राचीन चिकित्सा पद्धति के प्रसार को भी बल मिलेगा। इसके अलावा इन वनौषधि उद्यानों में सप्ताह में एक या दो दिन चिकित्सा कर्म भी शुरू किया जा सकेगा। इस योजना से जुड़े डा. प्रमोद शर्मा बताते हैं कि अब शीघ्र ही इस योजना को अंजाम तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे। पानी की उपलब्धता व जमीन की उर्वरकता को देखते हुए पहले चरण में 4-5 वनौषधि उद्यान का काम हाथ में लिया जाएगा। इसके बाद इनके अनुभव के आधार पर अन्य उद्यान विकसित किए जाएंगे। इसके लिए दिल्ली से भी वित्तीय सहायता लेने के प्रयास किए जा रहे हैं। फिलहाल इन उद्यानों की दीवार बनाने व जमीन के समतलीकरण व अन्य निर्माण के लिए नरेगा से काम करवाने को संबंधित कलक्टर को पत्र भेजे जा रहे हैं। हालांकि यहां पहले भी इसके तहत काम हुआ था, लेकिन बाद में लम्बे समय तक कोई काम न होने से अब यहां से दीवार के पत्थर ही गायब हो रहे हैं।
अब केन्द्र से उम्मीद
केन्द्र सरकार की नेशनल प्लान्ट्स बोर्ड के जरिए इन वनौषधि उद्यान के लिए अनुदान मिलता है। हालांकि पहले जो प्रस्ताव प्रदेश सरकार की ओर से भेजे गए थे, वे रद्द हो गए थे। अब फिर से प्रस्ताव भेजे जाएंगे। केन्द्र से इसके तहत इन वनौषधि उद्यान के लिए पहले वर्ष प्रति हैक्टेयर तीन लाख रुपए व इसके बाद प्रति हैक्टेयर 60 हजार रुपए प्रतिवर्ष रखरखाव के लिए अलग से मिलते हैं।
इन स्थानों पर बनेंगे वनौषधि उद्यान
राजसमंद में गुड़ली, टोकरा व बीकावास के अलावा किशनगढ़ (अजमेर), सुभाणा (भीलवाड़ा), हुडील (नागौर), गुंदोज (पाली), नाहरगढ़ (बारां), पढाणा (सवाईमाधोपुर), रतनगढ़ व तारानगर (चूरू), मोकलसर (बाड़मेर), जजावर, गोठड़ा व ढांकनी (बूंदी), रामपुरा भाटियान (जोधपुर), आबूरोड़(सिरोही)।

Rakesh Gandhi Editorial Incharge
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