क्षुल्लक तरुणसागर के प्रवचन सुन पुष्पदंतजी से बोले आचार्यश्री विद्यासागर...इन्हें मेरे साथ भेज दीजिए...

तरुण संवाद तेरहवां दिन: पुष्पगिरी पर क्षुल्लक पर्वसागर ने सुनाया जीवन दृष्टांत, गुरु पूजन कर मनाया अपना जन्मदिन

By: sachin trivedi

Updated: 13 Jun 2020, 09:08 PM IST

सोनकच्छ. समाधिस्थ जैन आचार्य तरुण सागर के जीवन संस्मरण के 26 दिवसीय संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत 13वें दिन शनिवार को तरुण सागर के एकमात्र शिष्य क्षुल्लक पर्व सागरजी ने सोशल मीडिया पर सवाल किया कि क्षुल्लक दीक्षा के उपरांत तरुणसागर सर्वप्रथम पुष्पदंतजी के साथ किस आचार्य से मिले और उन्हें प्रभावित किया। इसके बाद पूरा दृष्टांत सुनाया। गुरु आरती के अंतर्गत 13वें दिन की आरती पुष्पगिरि परिवार द्वारा की गई। प्रात: गुरु पूजा के अंतर्गत आज पुष्पगिरि में क्षुल्लक पर्व सागर के 24वें जन्मदिवस के साथ गुरु तरुण सागर की प्रतिमा की चरण पूजन अभिषेक के साथ की गई। पर्व सागर ने बताया कि घटना 1984 राजिम प्रवास की है। अकलतरा से मध्यप्रदेश की यात्रा पर अंग का निकलना हुआ। रास्ते में राजिम शहर में पहुंचना था। खबर लगी कि वहां पर आचार्य विद्यासागरजी अपने संघ के साथ प्रवासरत हैं। पुष्पदंतजी को भी अवगत करवाया गया कि यहां विद्यासागरजी विराजमान है और राजिम में विद्यासागरजी को सूचित किया कि पुष्पदंत सागर अपने बाल शिष्य तरुणसागर और संघ के साथ राजिम की ओर आ रहे हंै। सूचना सुनते ही दोनों श्रेष्ठ संतों ने मुलाकात का मन बनाया और समाज ने कार्यक्रम आयोजित किया। सुबह का वक्त नदी का किनारा उन दो श्रेष्ठ संत संघ के मिलन का साक्षी बना। मिलन के बाद गुरुओं को नगर में ले जाया गया और वहां एक धर्म सभा में मंच पर संपूर्ण संत संघ को बैठाया गया। कार्यक्रम में पुष्पदंत सागरजी और उनके बाद विद्यासागरजी का संबोधन होना था पर संचालक ने बाल संत क्षुल्लक तरुण सागर को माइक पर निमंत्रण दिया और कहा कि आज की प्रवचन सभा में सर्वप्रथम प्रवचन क्षुल्लक तरुणसागर करेंगे। उनके बाद दोनों बड़े गुरुओं को सुनेंगे। संचालक ने सोचा जनता शायद विरोध करेगी कि एक छोटे से बच्चानुमा नए संन्यासी को माइक दे रहे हैं। क्या बोलेगा क्या नहीं, जनता सुनना पसंद करेंगी या नहीं, लेकिन नजारा और जनता का रुख संचालक द्वारा तरुणसागर का प्रवचन निवेदन पर ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे वर्तमान में किसी बड़े वक्ता की उपस्थिति हो रही हो। गुरु आज्ञा पहले ही हो चुकी थी पर फिर भी क्षुल्लक तरुणसागर ने गुरु की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए मंच से गुरु आज्ञा चाही और नमन कर आंखों के इशारे से ही आज्ञा प्राप्त कर प्रवचन शुरू किया। खास बात यह थी कि प्रवचन बैठकर नहीं खड़े होकर किया। इसमें उन्होंने भगवान महावीर की जयघोष और दोनों संतों की जय वंदना करते हुए बोलना आरंभ किया। उनके प्रवचन में क्रांति की अंगड़ाई श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट हो गई।

प्रवचन सुन अभिभूत हो गया जनमानस
जब क्षुल्लक तरुणसागर ने भारी गर्जना के साथ कहा मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि आचार्य विद्यासागरजी को मोक्ष न हो। यह बात कहकर अपने वाक्य का चमत्कार देखने के लिए वे कुछ पलों के लिए मौन रह गए। तब जनता के दिल दिमाग मे भूचाल आ गया। क्या कह रहे हैं क्षुल्लक जी। क्यों कह रहे हैं ऐसा। लोग कौतूहल के सागर में डूबने उखडऩे लगे। तब तक क्षुल्लकजी ने अपने कथन की पुष्टि करने की गरज से आगे कहा मैंने मोक्ष न होने की बात ऐसे ही नही कही है। सोच विचार कर कही है। अपने स्वार्थ और पुरुषार्थ को जांच कर कही है। इनको मोक्ष न हो ताकि आपके और हमारे जैसे भूले-भटके मुमुक्षुओं को मोक्षमार्ग दिखाने वाले संत हमारे सामने रहे। आप और हम मोक्ष मार्ग पर चलने का ज्ञान एवं तप प्राप्त कर सकें। इसलिए जब तक हम लोगों को मोक्ष मार्ग न मिल जाए तब तक ये गुरु हमारे मध्य उपस्थित रहें क्योंकि उनके मोक्ष की तो प्रामाणिकता (गारंटी) समझ में आ चुकी है पर अभी हमारे मोक्ष की गारंटी नहीं है। क्षुल्लकजी के संबोधन से उस दिन विशाल सभा का एक-एक श्रोता अभिभूत हो गया। लोगों को उनकी सोच और उनकी कथन शैली पर भारी हर्ष हुआ। हर कंठ क्षुल्लक तरुणसागर की प्रशंसा से अनुगुंजित हो गया। कार्यक्रम के बाद आचार्यश्री विद्यासागर ने गुरु पुष्पदंतजी से कहा- आपके यह क्षुल्लकजी सधी हुई वाणी में और बड़ी अच्छी शैली में प्रवचन करते हैं। आवाज में जादुई करिश्मा है। इन्हें मेरे संघ में भेज दीजिये। गुरु का विनोद भाव था या आत्मभाव, कोई समझ न सका था। पुष्पदंतजी ने सविनय उत्तर दिया- यह सब आपके आशीष का सुफल है। यदि वो जाए तो ले जाइये अपने साथ। इस तरह 13वें दिन का संवाद समाप्त हुआ।

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