चरित्र का विकास सबसे बडा विकास और चरित्र का पतन सबसे बडा पतन

कोई व्यक्ति उंचे पद पर बैठने मात्र से उंचा नहीं होता। उंचा वही होता है, जिसका जीवन विचारों से विमल, आचरण से विशुद्ध और व्यवहार से शालीन होता है। विचार, आचार और व्यवहार की त्रिपुरी ही व्यक्ति को उंचा अथवा नीचा बनाती है। बाकी पद औपचारिक होते है। पदों की प्रतिष्ठा उज्जवल चरित्र से बनती है।

By: Ashish Pathak

Published: 10 May 2020, 03:03 PM IST

रतलाम. कोई व्यक्ति उंचे पद पर बैठने मात्र से उंचा नहीं होता। उंचा वही होता है, जिसका जीवन विचारों से विमल, आचरण से विशुद्ध और व्यवहार से शालीन होता है। विचार, आचार और व्यवहार की त्रिपुरी ही व्यक्ति को उंचा अथवा नीचा बनाती है। बाकी पद औपचारिक होते है। पदों की प्रतिष्ठा उज्जवल चरित्र से बनती है। निष्कलंक चरित्र से बढकर संसार में ना तो कोई पद उंचा है और ना ही प्रतिष्ठा है। मानव-मानव का चरित्र जब तक उज्जवन नहीं होगा, संसार की बढती हुई समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उज्जवल चरित्र के धनी व्यक्ति ही देश और समाज के गौरव होते है।

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Singrauli NTPC: Mahavir Swami jayanti in Jain Temple Vindhyachal
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यह बात शांत क्रांति संघ के नायक, जिनशासन गौरव प्रज्ञानिधि,परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी महाराज ने धर्मानुरागियों को प्रसारित संदेश में कही। सिलावटो का वास स्थित नवकार भवन में विराजित आचार्यश्री ने कहा कि कोरोना के इस संकट काल में हर मानव अपने चरित्र के निर्माण और विकास में संजीदा होना चाहिए। चरित्र का विकास सबसे बडा विकास और चरित्र का पतन सबसे बडा पतन है। भोगवादी और भौतिकतावादी दृष्टिकोण असंयम और विलासिता को बढावा देता है। इससे ही चरित्र का पक्ष कमजोर होता है। एक बार जीवन में स्वछंदता प्रवेश पा लेती है, तो अनुशासन, विवेक, संयम और व्यवस्था जैसे तत्व पलायन कर जाते है। इसके बाद जीवन, जीवन नहीं रहता अपितु मात्र ढांचा रह जाता है। उज्जवल और उन्नत चरित्र ही जीवन का आधारभूत तत्व है। पवित्रता उसका माध्यम है। पवित्रता और चरित्रशीलता एक-दूसरे के पर्याय है। आज के वातावरण में पवित्रता घट रही है, जिससे चरित्रशीलता का पतन हो रहा है।

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व्यक्ति की उच्घृंखलता बहुत बडी चुनौती


आचार्यश्री ने बताया कि स्वस्थ चिंतन, उदात चरित्र और प्रशस्त व्यवहार के उजाले यदि कदम-कदम पर बिछ जाए, तो कोई भी शक्ति हमारे देश के उजले भविष्य को छिन नहीं सकती। व्यक्ति की उच्घृंखलता बहुत बडी चुनौती है, इससे हर कोई जूझ रहा है। लेकिन इसके बाद भी कोई समाधान नहीं मिल रहा है। चरित्रशीलता ही सबसे बडा और महत्वपूर्ण समाधान है। विवेक और संयम चरित्रशील के मजबूत पहलू है। इनका विकास होने पर ही उच्घंृखलता को नियंत्रित किया जा सकता है, अन्यथा ये आने वाली पीढी के लिए बहुत बडा खतरा साबित होगी। यदि वातावरण स्व नियमन से प्रभावित हो जाए, तो बढती हुई उच्घंृखलता की रीढ टूट सकती है। उज्जवल चरित्र की बुनियाद पर ही आत्म शांति और आत्म विकास की मंजिलें खडी हो सकती है।

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कथनी और करनी में समता रखने वाला ही संत
आचार्यश्री ने कहा कि चरित्र को पवित्र और जीवन को उज्जवल बनाने की कला एंव विज्ञान जिसने नहीं सीखा हो, उसका सारा जीवन खूबसूरत होकर भी व्यर्थ हो जाता है। यह विज्ञान स्कूलों एवं कालेजों से प्राप्त नहीं होता, अपितु संतों-मुनियों की वाणी से प्राप्त होता है। संत उत्तम पुरूष होते है। उनके आचार,विचार, व्यवहार की शुद्धता ही उनकी पहचान होती है। कथनी और करनी में समता रखने वाला ही संत- होता है। चरित्रनिष्ठ संतो के वचन बाद में बोलते है,उनका आचार पहले बोलता है। आचार की पवित्रता और विचार की विमलता जिन संतों की धरोहर होती है, वे जाति, समाज और देश का कायाकल्प कर सकते है।

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