रिश्वत लेते लोकायुक्त में पकड़े गए पूर्व सीएमएचओ डॉ. पुष्पेंद्र शर्मा बरी

वर्ष 2015 में कर्मचारी से रिश्वत लेने के मामले में लोकायुक्त टीम उज्जैन ने किया था ट्रेप

By: Yggyadutt Parale

Published: 01 Mar 2020, 05:25 PM IST

रतलाम। वर्ष 2015 में बहुचर्चित रिश्वत मामले में जिले के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. पुष्पेंद्र शर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश राजेंद्र कुमार दक्षणी ने दोषमुक्त कर दिया है। 16 सितंबर 2015 को लोकायुक्त उज्जैन की टीम ने रिश्वत के मामले के उनके ही घर से ट्रेप करते हुए गिरफ्तार कर उनके खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। करीब साढ़े चार साल चले केस के बाद कोर्ट ने 39 पेज के अपने निर्णय में उन्हें इन आरोपों से दोषमुक्त करने का आदेश दिया। निर्णय सुनाने के दौरान डॉ. शर्मा और उनके कुछ परिचित कोर्ट में मौजूद थे। जैसे ही उनके पक्ष में निर्णय आया उनके चेहरे पर एक सुकुन भरा एहसास देखने को मिला। उन्होंने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा आखिर में सत्य की जीत हुई है।
यह था मामला
13 सितंबर 2015 को तत्कालीन सीएमएचओ द्वारा गठित टीम ने बेड़दा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ ड्रेसर रुस्तम सिंह नरवरिया के निजी क्लीनिक पर छापा मारकर कार्रवाई की थी। इसका प्रतिवेदन मिलने के बाद 15 सितंबर को पुलिस में प्रकरण दर्ज कराया गया था। ड्रेसर नरवरिया की बेटी डॉ. ऋतु वर्मा ने 15 सितंबर को लोकायुक्त उज्जैन को शिकायत की थी कि उनके पिता को प्रकरण से बचाने के लिए तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. शर्मा ने पांच लाख रुपए की रिश्वत की मांग की है। उनका कहना था कि वे छोटी धाराओं में प्रकरण पंजीबद्ध करवा देंगे जिससे वे आसानी से बच जाएंगे। इसी के बदले यह राशि मांगी गई है। इस पर लोकायुक्त टीम ने उन्हें वायस रिकार्डर देकर उससे रिकार्डिंग करवाई और फिर अगले दिन 16 सितंबर को लोकायुक्त टीम ने डॉ. शर्मा को उनके निवास पर ही डॉ. ऋतु वर्मा द्वारा तीन लाख रु. रिश्वत के बतौर दिए जाने के दौरान पकड़ा था। ऋतु वर्मा ने यह राशि उनके कमरे में रखी थी तभी लोकायुक्त टीम ने अपनी कार्रवाई कर दी थी। लोकायुक्त टीम ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1980 की धारा 7 एवं 13(1)(घ) सहपठित धारा 13(2) में प्रकरण दर्ज किया था। 16 सितंबर को ही लोकायुक्त टीम ने उन्हें गिरफ्तार करके मुचलके पर छोड़ दिया गया था।
12 सितंबर को बनाई थी टीम
तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. शर्मा ने ड्रेसर नरवरिया के क्लीनिक पर कार्रवाई के लिए 12 सितंबर को टीम बनाई थी। टीम में तत्कालीन डीएचओ डॉ. आरएन राजलवार, बीएमओ डॉ. शैलेष डांगे, प्रमोद कुमार प्रजापति, तत्कालीन डीपीएम वीरेंद्र सिंह रघुवंशी, आशीष चौरसिया को लिया गया था। टीम ने 13 सितंबर 2015 को ड्रेसर नरवरिया के क्लीनिक की जांच की थी। अगले दिन टीम ने अपना प्रतिवेदन डॉ. शर्मा को सौंपा और 15 सितंबर को पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इसी दिन डॉ. ऋतु वर्मा ने लोकायुक्त को डॉ. शर्मा द्वारा रिश्वत मांगे जाने की शिकायत की थी। इस पर टीम ने अगले दिन 16 सितंबर को घेराबंदी की थी। बताया जाता है कि लोकायुक्त टीम 16 सितंबर को सुबह उज्जैन से निकली थी और दोपहर में रतलाम पहुंच गई थी किंतु डॉ. शर्मा के नहीं मिलने और चौकीदार द्वारा रात आठ बजे आने की बात कही जाने पर टीम रतलाम में ही ठहरी रही और रात आठ बजे डॉ. ऋतु वर्मा फिर से डॉ. शर्मा के घर पहुंची थी और राशि उनके घर पर रख दी थी। यह माना कोर्ट ने- कोर्ट ने इस बिंदु को भी निर्णय में अहम माना कि आरोपी डॉ. शर्मा विधि विशेषज्ञ नहीं है और न ही उनके हाथ में धाराओं को घटाने या बढ़ाने का अधिकार था। यही नहीं उन्हें अग्रिम जमानत देने का भी अधिकारी नहीं था।
कोर्ट ने वायस रिकार्डर का परीक्षण करने पर पाया कि उसमें डॉ. ऋतु वर्मा की आवाज स्पष्ट है और सभी शब्द समझ में आ रहे हैं, लेकिन दूसरी आवाज डॉ. शर्मा की बताई जा रही है वह अस्पष्ट और बहुत धीमी है। इसमें रिश्वत संबंधी शब्द भी अस्पष्ट है। लोकायुक्त ने वायस सेंपल और रिकार्डिंग की फारेंसिक जांच भी नहीं करवाई। इसलिए जांच नहीं करवाई गई शायद ये सेंपल फेल हो जाते।- रिश्वत के रूप में राशि देने के लिए दो लाख रुपए चेक से निकालने, 40 हजार रुपए एटीएम से निकालने की बात कही गई। दी गई राशि में 500-500 के 300 नोट और 100-100 के 500 नोट होने की बात सामने आई थी, जबकि कहा गया कि रिश्वत 1000-1000 के नोट में दी गई।

Yggyadutt Parale Desk
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