scriptForest tourism of sanctuaries in paper, cheetahs are not visible | कागजों पर अभयारण्यों का वन पर्यटन, चीता आए न नजर आ रहे खरमौर | Patrika News

कागजों पर अभयारण्यों का वन पर्यटन, चीता आए न नजर आ रहे खरमौर

कागजों पर अभयारण्यों का वन पर्यटन, चीता आए न नजर आ रहे खरमौर
आंखों को तरसा रहे 'मेहमान'
4 बड़े अभयारण्यों में तैयारियों का शोर, मकसद पूरा करने पर नहीं जोर

रतलाम

Updated: April 26, 2022 08:25:57 pm

सचिन त्रिवेदी

रतलाम. मध्यप्रदेश के मालवांचल के 4 अहम अभयारण्य वर्षो से कागजी दावों में वन पर्यटन का केन्द्र बने हुए है, जबकि यहां पहुंचने वाले पर्यटकों का कोई स्थाई आंकड़ा नहीं है। अभयारण्य में कुछ खास पशु-पक्षियों का नया बसेरा बनाने का प्रयास भी वर्षो से चल रहा है। मंदसौर के गांधीसागर, रतलाम के खरमौर, आगर-मालवा के गौ और देवास जिले से लगे खिवनी अभयारण्य में नए मेहमान का इंतजार आंखों को तरासा रहा है। गांधीसागर में चीता लाने की कवायद बार बार कभी हां तो कभी ना में बदल रही है। वहीं, खरमौर की संख्या बढ़ाने के दावे भी खोखले निकल रहे हैं तो गौ अभयारण्य के आसपास पशुओं का हलक संकट है। देवास जिले से लगे खिवनी अभयारण्य में भी बाघ जंगल में तलाशते नहीं मिल रहे। बहरहाल, कुछ उम्मीद हाल की पशु-पक्षी गणना के दौरान मिले संकतों और वाइल्ड लाइफ टीमों के नए सर्वे से जाग रही है।
Forest tourism in sanctuaries in paper, cheetahs are not visible
Forest tourism in sanctuaries in paper, cheetahs are not visible
गांधीसागर अभयारण्य....मंदसौर


मध्यप्रदेश में अफ्रीकी चीता बसाने की योजना का एक चरण राजस्थान से लगे मंदसौर-नीमच जिले में फैले गांधीसागर अभयारण्य में भी चल रहा है। वर्ष 2019-20 के दौरान शुरू की गई कवायद वर्ष 2022 तक भी आकार लेती नजर नहीं आ रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून से लेकर कई टीमों ने गांधीसागर क्षेत्र का दौरा कर लिया है। कुछ रिपोट्र्स में तो चीता बसाने की योजना ठंडे बस्ते में जा चुकी है, लेकिन हाल ही में फिर से चीता बसाने के लिए गांधीसागर अभयारण्य प्रबंधन ने तैयारी शुरू कर दी है। वर्ष 2021 से 2022 के दौरान गांधीसागर के 12 पाइंटों पर चीते का आहार चीतल छोडऩे का कार्य हो रहा है।
खरमौर अभयारण्य...रतलाम


विलुप्त प्रजाति की श्रेणी वाले खरमौर पक्षी के संरक्षण के लिए रतलाम और झाबुआ जिले में खरमौर अभयारण्य का दायरा निर्धारित किया गया है। वन विभाग ने इसे पर्यटकों को आकर्षित करने बनाने के लिए खरमौर की विशेषताओं को प्रचारित तो किया, लेकिन जब पर्यटक अभयारण्य इलाकों में गए तो कई दिनों के इंतजार के बाद भी निर्धारित 8 पाइंटों पर ये पक्षी नजर ही नहीं आया। वन विभाग का रेकॉर्ड बताता है कि वर्ष 2021 से 2022 के दौरान अब तक महज 3 खरमौर नजर आए है। हालांकि ये प्रवासी हैं और वर्ष में दो से तीन माह के दौरान ही दिखते हैं, लेकिन इनका निर्धारित पाइंट पर नहीं दिखना पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी का दावा खोखला कर रहा है।
गौ अभयारण्य...सालरिया


प्रदेश के आगर-मालवा जिले में करीब 40 करोड़ की लागत से बने गौ अभयारण्य की अव्यवस्थाएं पर्यटकों को आने से रोक रही है तो गौ संवर्धन की गतिविधियां भी परिणाम नहीं ला पा रही है। वर्ष 2020 के दौरान एक दर्जन से ज्यादा गायों की मौत के बाद यहां गौ कैबिनेट की बैठक भी हुई और करीब 12 करोड़ रुपए से नया आकार देने का दावा किया गया, लेकिन वर्ष 2022 तक भी गौ अभयारण्य योजना अनुसार आगे नहीं बढ़ पाया है। फिलहाल यहां गौ संरक्षण, नई प्रजातियों की जानकारी, गौ पालन, गौ पालकों को प्रशिक्षण के साथ ही उच्च प्रजाति की गायों को लाने का प्लान है, इनमें कुछ गतिविधियां चल रही है तो कुछ कागजों से बाहर नहीं निकली।
खिवनी अभयारण्य...देवास


विंध्याचल पर्वतमालाओं से पटे खिवनी अभयारण्य का प्राकृतिक सौंदर्य और करीब 110 प्रजातियों के पक्षियों के बसेरे के चलते वन पर्यटन का बड़ा केन्द्र माना जाता है, लेकिन संभागीय वन कार्यालय का ताजा आंकड़ा वन पयर्टन के अनुकूल नहीं लगता। वर्ष 2021 के कोरोनाकाल के दौरान से ही यहां पर्यटकों की संख्या कम हो रही है। हालात वर्ष 2022 में भी ज्यादा नहीं बदले हैं। कीमती सागौन का घना जंगल भी देवास से सीहोर जिले के इच्छावर तक फैला है। साथ ही बाघ देखे जाने के संकेत मिले हैं, लेकिन संख्या क्या होगी ये बताने में अफसर आश्वस्त नहीं है।
अभी बसा रहे चीतल, चीता आने में समय लगेगा


अफ्रीकी चीता लाने की प्रक्रिया चल रही है, करीब 1200 चीतल छोडऩे का प्लान है, अब तक 800 चीतल छोड़ दिए गए है, आंतरिक सर्वे चल रहा है। इसके बाद केन्द्रीय टीम सर्वे करेगी, इसके बाद ही चीता यहां लाने पर अंतिम निर्णय होगा।
- आदेश श्रीवास्तव, जिला वन अधिकारी मंदसौर

प्रवासी पक्षी है

प्रवासी पक्षी है इसलिए समय पर नजर नहीं आतेखरमौर प्रवासी पक्षी है, ये पहले हर साल देखे जा रहे थे, लेकिन बीते कुछ वर्षो में इनके आने का समय भी बदला है और समय पर सूचना नहीं मिलने के कारण ट्रैक नहीं होपाते। इसलिए पर्यटक आते है तो कम ही दिखते हैं, अभयारण्य में हम सीसीटीवी आदि लगाकर सुविधाएं बढ़ा रहे हैं।
- डीएस डुडवे, वन मंडल अधिकारी रतलाम

एक्सपर्ट व्यू...

मालवांचल के जंगल अनुकूल


वन्य जीव संस्थान के साथ ही कई अन्य संस्थाएं भी समय समय पर कराए गए सर्वे और गतिविधियों में ये मानते हैं कि मालवांचल के जिलों में फैले जंगल कई तरह के पशु-पक्षियों के लिए अनुकूल है और वहां उसी अनुसार कार्य किया जाए तो परिणाम बेहतर आएंगे। पशु-पक्षियों का संरक्षण तो होगा ही साथ ही वन पर्यटन को भी बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके साथ हमें यह ध्यान रखना होगा कि वन पर्यटन से वन के असल हकदार पशु-पक्षी प्रभावित ना हो। कोरोना ने हर तरह के पर्यटन को प्रभावित किया है। ऐसे में नए सीरे से सोचने की आवश्यकता है, मंदसौर-नीमच जिले में कई तरह की औषधि भी जंगलों में है। खिवनी में 100 से ज्यादा प्रजाति के पक्षी दिखते हैं।

- डॉ. खुशालसिंह पुरोहित, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पर्यावरणवीद एवं वन पर्यटन जानकार

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IMAGE CREDIT: patrika

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