बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति के लिए आखिर कौन है जिम्मेदार

पहले बच्चों को मौत का मतलब अच्छे से नहीं पता होता था। आज वे मौत को किसी समस्या के उपाय की तरह देखने लगे हैं

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Published: 10 Nov 2017, 10:52 AM IST

प्रद्युम्न मर्डर केस की नई रिपोर्ट चौंकाने वाली है। जांच में स्कूल में ही पढऩे वाले 11वीं कक्षा के एक 16 वर्षीय छात्र पर प्रद्युम्न की हत्या का आरोप सीबीआई ने लगाया है। बताया जा रहा है कि आरोपी लडक़ा पढ़ाई में कमजोर था और साथियों के साथ मार-पीट करने पर आमादा रहता था। कितना डरावना है यह सब! आरोपी को तो शायद सजा मिल जाएगी, लेकिन गुनाह के रास्ते में अन्य किरदार भी कम जिम्मेदार नहीं है। कम उम्र में समझ कहां होती है कि वे अच्छा-बुरा समझ सकें। उन्हें समझाने वाले तो उनके अभिभावक और शिक्षक ही हैं। बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति की जिम्मेदारी समाज को लेनी होगी।

बढ़ रहे हैं हत्या के मामले

जुलाई, 2017
जोधपुर के रतकुडिय़ां गांव में 15 साल का एक छात्र वीरेंद्र जब स्कूल से काफी देर तक घर नहीं आया, तो उसके मां-बाप सहपाठी के घर पहुंचे। वहां सहपाठी और उसके मां-बाप उनके मृत बेटे को घर से बाहर फेंक रहे थे। तीनों उन्हें देखकर फरार हो गए।

4 अगस्त, 2017
मध्य प्रदेश के एक हायर सेकंडरी स्कूल के सामने १२वीं कक्षा के एक छात्र ने अपने सहपाठी अभय की चाकू मार कर हत्या कर दी। कुछ दिनों से दोनों के बीच कोई मामूली-सा विवाद चल रहा था।

सितंबर, 2017
छत्तीसगढ़ के कांकेर के भानुप्रतापपुर इलाके में एक स्कूल के हॉस्टल में एक छात्र को उसके सीनियर छात्रों ने इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी जान पर बन आई। उसका इलाज करवाना पड़ा।

छोटी गलतियों को नजरअंदाज न करें...

आज बढ़ते एकल परिवारों में कामकाजी मां-बाप बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। उनकी गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान न देेने से वे स्वतंत्र हो जाते हैं। आज टीवी, इंटरनेट पर उपलब्ध हिंसक सामग्री और वीडियोज उनमें हिंसा बढ़ा रहे हैं। पहले बच्चों को मौत का मतलब अच्छे से नहीं पता होता था। आज वे मौत को किसी समस्या के उपाय की तरह देखने लगे हैं। मन का न होने पर आवेश में वे मौत की राह चुन लेते हैं। इसलिए बच्चों पर पर्याप्त ध्यान देना बेहद जरूरी है। पिछले माह भागलपुर के एक पर्यवेक्षक गृह में बंद बच्चों के अभिभावकों से बात की गई। उनमें से एक मां का कहना था कि कहीं न कहीं हमारी चूक ही हमारे लाड़लों को सलाखों के पीछे पहुंचा रही है। उनकी छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने की कीमत हम आज चुका रहे हैं।

पढ़ाई के दबाव से बढ़ रहा है अवसाद

बच्चों पर पढ़ाई का ज्यादा दबाव भी उनमें कई तरह की समस्या पैदा करता हे। इससे उन्हें झूठ बोलने की आदत भी हो जाती है। कुछ मां-बाप तो अपने बच्चों को बहुत कड़ी सजा देते हैं। परिणामस्वरूप डर और अवसाद उन्हें अपराधों की तरफ धकेलते हैं।

मानसिक रूप से व्यथित बच्चे

सिर्फ दूसरों की जान ही नहीं ले रहे हैं, बल्कि अपनी जान भी दे रहे हैं। यह जरूरी है कि सभी स्कूलों में एक काउंसलर की नियुक्ति की जाए, जिससे कि समय रहते समस्या सुलझ जाए और बच्चों में बढ़ते अपराध को रोका जा सके।

अभिभावक खुद को करें शिक्षित

मां-बाप के पास इतना समय नहीं कि वे अपने बच्चे में अवसाद के लक्षणों को पहचान उन्हें डील करें। अवसाद ही अपराधों को बढ़ावा देता है।
इससे निपटने के लिए अभिभावकों को खुद को शिक्षित करना होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि बच्चों की तुलना किसी से न करें और उनकी अपेक्षाओं को समझें। - अरविंद ओत्ता, सीनियर साइकोलोजिस्ट

अकेलापन है हानिकारक

अकेलापन मानसिक अवसाद को तेजी से बढ़ाता है। ऐसे में बच्चों को पर्याप्त समय देते हुए उनकी समस्याओं को सुन कर ऐसे हादसों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। - पूनम क्षेत्रपाल सिंह, डब्ल्यूएचओ की दक्षिण एशिया क्षेत्र की निदेशक

जिम्मेदारी लेनी होगी

बच्चों के लिए समाज में जवाबदेही फिक्स नहीं है। टीचर्स से बच्चों को संभालने की उम्मीद की जाती है, पर उन्हें अधिकार नहीं होता कि बच्चों को सजा दे सकें। हकीकत में मां-बाप और स्कूल दोनों को जिम्मेदारी लेनी होगी। - अनीता मिश्रा, समाजशास्त्री

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