गौ-माता - 5

Shri Gulab Kothari

Publish: Aug, 22 2017 03:27:00 (IST)

Religion and Spirituality
गौ-माता - 5

छन्दोविज्ञान के अनुसार दस अक्षर की समष्टि का ही नाम ‘विराट’ है

५-विराट्-गौ:

छन्दोविज्ञान के अनुसार दस अक्षर की समष्टि का ही नाम ‘विराट’ है। ‘विराड् वै यज्ञ:’। प्रकृति में विराट् से प्रादुर्भूत होने वाला ‘दशर्षिप्राण’ ही अभिप्रेत है। इसी दशर्षिप्राण समष्टि रूप विराट् से सम्पूर्ण प्राणियों का आयु निष्पन्न होता है। ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ के अनुसार आयु:स्वरूप-रक्षक आत्मा का अधिष्ठाता एकमात्र सूर्य ही है। ‘सूर्यो बृहती मध्यढस्तपति’ के अनुसार आत्मा अधिष्ठाता सूर्य मध्यस्थ ‘बृहतीछन्दोरूप विष्वद्वृत्त’ पर स्थिररूप से तप रहे हैं। विषुव से उत्तरभाव में ३ अहोरात्रवृत्त हैं, एवं तीन अहोरात्रवृत्त ही दक्षिण में हैं। इनमें जेा दक्षिणभाग का सबसे अन्त का अहोरात्रवृत्त है, वही ‘गायत्री’ छन्द कहलाता है। उसमें ६ अक्षर हैं। आगे का सप्ताक्षर उष्णिक् छन्द है। उसके चरणों के अनुपात से ३६ अक्षर हो जाते हैं।

पूरे बृहतीछन्द में ३६० अंश हैं। इसमें ९०-९० अंश के ४ खण्ड है। प्रत्येक खण्ड में १० संख्या के अनुपात से ९-९ विराट् हो जाते हैं। इस प्रकार पूरे वृत्त से ३६ विराट् सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है। प्रत्येक विराट के साथ ‘गौसाहस्त्र’ का संबंध है। ऐसी अवस्था में ३६ बृहती की ३६००० बृहती हो जाती हैं। यही हमारी आयु का प्रमाण है। हम प्रकृति के नियमानुसार ३६००० अहोरात्र ही जीवित रह सकते हैं। ३६००० दिन के कुल १०० वर्ष होते हैं। इसी विज्ञान के आधार पर ‘शतायुर्वेपुरुष:’ यह कहा जाता है।

विराट्तत्त्व ही विराट् गौ है। इसका उक्थस्थान (प्रभवस्थान) मनु ही है। एक प्रकार से मनु उक्थ है, तो विराट् गौ उसका अर्क है। अर्क अपने उक्थ के साथ नित्य सम्बन्ध है। इसी विराट् गौ के साथ, दूसरे शब्द में विराट्-ऋषभ (महावृषभ) के साथ युक्त होकर भगवान् मनु यज्ञ कर रहे हैं। यही हमारे प्रकृति प्रकरण का ऋषभ है। इस ऋषभ की जहां तक व्याप्ति है, वहां तक आसुरप्राण कदापि प्रविष्ट नहीं हो सकता।

गौमूत्र से चिकित्सा
गौमूत्र तो शरीर की अनेक व्याधियों की चिकित्सा में काम आता है। गौमूत्र सेवन से पवित्रता भी प्राप्त होती है। यह कफ-वात के तीव्र शूल को नष्ट करता है। उदराग्नि दीपन करता है। आफरा आने पर इसका सेवन लाभकारी है। यह उग्र व्याधियों का शमन करने में सहायक है। ‘श्री जी’ के अनुसार गौमूत्र में २४ क्षार उपलब्ध होते हैं। ६ प्रकार के खनिज द्रव्य रहते हैं। अत: यह परम शक्तिशाली दिव्य औषधि है। गौ मूत्र में तांबा होता है। ताम्र धातु स्वयं में विशिष्ट औषधि है।

गौमाता सरल स्वभाव है। निर्मल चित्त वाली है। सेवा से शीघ्र प्रसन्न होने वाली है। जैसे पंचगव्य अपावन को पावन करने वाला है। रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली आदि को नष्ट करता है, वैसे ही पंचामृत (दूध, दही, घृत, मधु, शक्कर) भगवान के अभिषेक में काम आता है। अतिशय पवित्र है।

एक समय था जब गौ रक्षा राष्ट्रधर्म जैसा माना जाता था। राजा दिलीप (दशरथ के पिता) की गौरक्षा का उदाहरण जन-जन की स्मृति में है। इतना ही नहीं सम्पदा के रूप में अतीव महत्वपूर्ण होने के कारण गौ का मुद्रा रूप में भी प्रचलन था। दक्षिण में तो बड़े ऋषियों को गाएं ही भेट की जाती थीं। तब गौ क्यों न अवध्य हो!

गौ को आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक-त्रिविध तापों का शमन करने वाली कहा है। जो इच्छित वर प्रदाता है। गौ एक ओर गति तत्त्व को इंगित करती है, वहीं सूर्य के मनोता रूप में गौ-विद्युत शक्ति का पर्याय भी है। गौ-पशु में भी यह विद्युत शक्ति सर्वाधिक होती है। अत: इसको ‘गौ’ कहते हैं।

कृष्ण से प्रार्थना की जाती है कि आप अपनी गौमाता पर हो रहे अत्याचार, इस घोर संहार को कैसे सह रहे हैं। आपने अपने गीता के वचन ‘परित्राणाय साधूनाम’ को कैसे भुला दिया है। विलम्ब न करें, अविलम्ब इस महाविनाशकारी कृत्य का परिहार करें। कामधेनु रूप गौमाता तो मुक्ति प्रदान करें।

क्यों भटकती दिखती हैं गौएं
गौदान को दिव्य फल देने वाला कहा है। यह ऊध्र्व लोकों की प्राप्ति कराने वाला है। उसके बाद भी एकमात्र गौ भटकती दिखाई पड़ती है। अन्य दूध देने वाले पशु-भेड़-बकरी, ऊंट, घोडी, गधी कहीं भटकते नजर नहीं आते। राजस्थान तो गौपालन में श्रेष्ठ रहा है। सही अर्थों में राजस्थान गौपालकों, गौरक्षकों की भूमि है। यहां पश्चिमी क्षेत्र में बहुत बड़ी मात्रा में गौ वंश वृद्धि के कार्य होते हैं। यहां की जलवायु उष्ण एवं भूमि रेतीली है। यहां के पशु, विशेषकर गौ और बैल देशभर में जाते हैं। लोगों के पास सैकड़ों गाएं होती हैं जिनको नाम से पुकार कर बुलाया जाता है।

राजस्थान में गाय को ही लक्ष्मी कहते हैं। दिवाली पर ‘हीडें’ गाई जाती हैं जो पशुधन से जुड़े गीत हैं। दीपावली के अगले दिन नए अनाज से अन्नकूट की परम्परा तथा इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा एवं बैल पूजा होती है। आदिवासी समाज में तो अलग से दीपावली का त्यौहार मनाया ही नहीं जाता। वहां गाय को लक्ष्मी रूप माना जाता है। मान्यता है कि गौ के अंग-अंग में कोटि-कोटि देवताओं का निवास है। अत: गौधन वन्दनीय है। ‘श्रीजी’ के ही शब्दों में- ‘जो भक्त श्रद्धापूर्वक गौदान’ में तत्पर हैं, वह इस पंचभौतिक देह के त्याग करने पर गौपुच्छ का आश्रय पाकर परमदिव्य लोक को प्राप्त करता है। वहां दिव्यादि दिव्य अनन्त वैभवपूर्ण आनन्द का उपभोग करता है।

प्रतिदिन गौ पूजन करना चाहिए। नित्य गौ ग्रास देने का विधान शास्त्रों में है। गौ सेवा सुखप्रद है। गौ माता को गंगाजी से अधिक पावन कहा गया है। वैसी शुभ और उत्तम वस्तु भूतल पर नहीं है। गौ माता की परिक्रमा का उत्तम विधान है। गौ दर्शन सर्वदा सुखद है। यह माता धेनु रूप अतीव महान है।’

राज्य भर में गौशालाओं की बड़ी शृंखला है। पानी का अभाव बड़ी समस्या है। अकाल में तो चारा भी अन्य प्रदेशों से मंगवाया जाता है। फिर भी इस कार्य के प्रति अटूट श्रद्धा है। सरकारी क्षेत्र में अवश्य लापरवाही से प्रतिवर्ष हजारों गाएं मरती हैं। गौ-मांस को लेकर देश में अनेक बार विवाद होते रहते हैं। यह भी नेताओं के लिए ‘दूध देने वाला व्यापार’ बन गया है। कहीं-कहीं साम्प्रदायिक दंगे भी होते रहते हैं। आज का परिदृश्य देश की आस्थाओं से कोसो दूर निकल गया है। भविष्य में लगता है कि धर्म का स्थान व्यापार एवं बुद्धि ले लेगी। विदेशी गायों का प्रजनन जिस तेजी से बढ़ा है, बछड़े जिस तरह अनुपयोगी होकर कत्लखाने भेजे जाने लगे हैं, अधिक दूध के लिए इंजेक्शन लगा रहे हैं, ये सब गौमाता के भविष्य को इंगित करते हैं।

देसी गायों का भविष्य तो अंधेरे में ही दिखाई दे रहा है। सरकार का नहरीकरण कार्यक्रम एवं हरित क्रान्ति ने गायों के पलायन का मार्ग खोल दिया। चारा पैदा होना ही बन्द हो गया। गाएं कितनी पीढ़ी तक और देखी जा सकेंगी आज यह कहना मुश्किल है।
समाप्त

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