विचार मंथन : जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित- महर्षि आरुणि

विचार मंथन : जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित- महर्षि आरुणि

जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित- महर्षि आरुणि

विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है

महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया । साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये । यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी । गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था । वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था । अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये ।

 

निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया । उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ । दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया । वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है ।

 

महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये, मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये, चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है, किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है । जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे । पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये । महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा- अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था ।

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