विचार मंथन : भगवान् का आमन्त्रण स्वीकारने वाले कभी घाटे में नहीं रहते- प्रज्ञा पुराण भाग

विचार मंथन : भगवान् का आमन्त्रण स्वीकारने वाले कभी घाटे में नहीं रहते- प्रज्ञा पुराण भाग

भगवान् का आमन्त्रण स्वीकारने वाले कभी घाटे में नहीं रहते- प्रज्ञा पुराण भाग

 

यह एक प्रमाणित तथ्य हैं कि जिन्होंने भगवान का आमन्त्रण सुना है वह कभी घाटे में नहीं रहे । बुद्ध ने 'धर्मम् बुद्धम् संघम् शरणम् गच्छामि' का नारा लगाया और संव्याप्त अनीति-अनाचार से जूझने हेतु आमन्त्रण दिया तो असंख्यों व्यक्ति युग की पुकार पर सब कुछ छोड़कर उनके साथ हो लिए । उन्होंने तत्कालीन व्यवस्था को बदलने के लिए उन भिक्षुओं के माध्यम से जो बौद्धिक क्रान्ति सम्पन्न की, उसी का परिणाम था कि कुरीतियुक्त समाज का नव निर्माण सम्भव हो सका ।

 

इसी तरह का चमत्कार गाँधी युग में भी उत्पन्न हुआ । अंग्रेजों की सामर्थ्य और शक्ति पहाड़ जितनी ऊँची थी । उन दिनों यह कहावत आम प्रचलित थी कि अंग्रेजों के राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था । बुद्धि, कौशल में भी उनका कोई सानी नहीं था । फिर निहत्थे मुट्ठी भर सत्याग्रही उनका क्या बिगाड़ सकते थे । हजार वर्ष से गुलाम रही जनता में भी ऐसा साहस नहीं था कि इतने शक्तिशाली साम्राज्य से लोहा ले सके और त्याग-बलिदान कर सके । ऐसी निराशापूर्ण परिस्थितियों में भी फिर एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा और स्वतन्त्रता संग्राम छिड़ा, यही नहीं अन्तत वह विजयी होकर रहा ।

 

उस संग्राम में सर्वसाधारण ने जिस पराक्रम का परिचय दिया वह देखते ही बनता था । असमर्थो की समर्थता, साधनहीनों को साधनों की उपलब्धता तथा असहायों को सहायता के लिए न जाने कहाँ से अनुकूलताएँ उपस्थित हुई और असम्भव लगने वाला लक्ष्य पूरा होकर रहा ।

 

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