विचार मंथन : राजा विक्रमादित्य को राज्य के त्याग में सुख क्यों दिखाई दिया- प्रज्ञा पुराण

विचार मंथन : राजा विक्रमादित्य को राज्य के त्याग में सुख क्यों दिखाई दिया- प्रज्ञा पुराण

राजा विक्रमादित्य त्याग

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था, वह निर्धन था। एक दिन स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्ति घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई उन्होंने उसे चिंतित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को पत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहां चले आओ।

 

वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य सौपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्द विभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा कि- महाराज मैं अभी महात्माजी के पास पुन जा रहा हूं, लौटकर राज्य लूंगा। यह कह कर योगी के पास पहुंचकर बोला कि भगवन् राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो गया। इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए।

 

महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।

 

जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्तत : त्रास ही पाते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े होने पर भी ऐसे मन्द बुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है।

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