विचार मंथन : ब्रजवासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मतत्व की प्राप्ति हो जाती है- संत सूरदास

ब्रजवासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मतत्व की प्राप्ति हो जाती है- संत सूरदास

By: Shyam

Published: 08 May 2019, 06:30 PM IST

सूरदास जी की रचनाओं में कृष्ण भक्ति का भाव उजागर होते हैं। वहीं उन्होंने अपनी रचनाओं में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके सुंदर रूप का इस तरह वर्णन किया है कि मानों उन्होंने खुद अपनी आंखों से नटखट कान्हा की सभी लीलाओं को देखा हो। जो एक बार भी सूरदास जी की रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है।

 

अरे मन तू ब्रज में ही रह
ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं और अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उसी भूमि पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं। अरे मन! तू काहे इधर उधर भटकता है। ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती है। यहां न किसी से लेना, न किसी को देना, सब कृष्ण के ध्यान में हर पल मग्न रहते हैं। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मतत्व की प्राप्ति होती है। ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती।

 

खंभे में अपना प्रतिबिंब
श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता हैं वो गाते हैं। वह छोटे छोटे पैरो से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं। कभी वे भुजाओं को उठाकर काली श्वेत गायों को बुलाते है, तो कभी नंद बाबा को पुकारते हैं और घर में आ जाते हैं। अपने हाथों में थोड़ा सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैं, तो कभी खंभे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं। मैया यशोदा श्रीकृष्ण को कभी पालने में झुला रही है, तो कभी पालने को धीरे से हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं।

 

ऐसा सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है
मां यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फड़काते हैं। श्रीकृष्ण को सुलाने के लिए मैया मधुर मधुर लोरियां भी गाने लगती है। सूरदास जी नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बड़भागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।

 

रसिक श्रीकृष्ण ने जब राधा रानी को..
राधा रानी से प्रथम मिलन पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पूछा की हे गोरी! तुम कौन हो? कहां रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी की नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है। इस पर श्रीकृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं। इस प्रकार रसिक श्रीकृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा रानी को भरमा दिया।

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