विचार मंथन : जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं किया, उसको हाथ मल-मल कर पछताना ही पड़ेगा- स्वामी विवेकानंद

विचार मंथन : जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं किया, उसको हाथ मल-मल कर पछताना ही पड़ेगा- स्वामी विवेकानंद

भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही

यौवन की जिम्मेदारी

युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, उन्माद और क्रिया शीलता का तरंगें प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है। अब तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उसकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई हैं। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने के कारण उनसे किसी महान् कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है।

 

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मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है

वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पछताना ही शेष रह जाता है।

 

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जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं

यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहां के युवकों में आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।

 

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भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही

एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

 

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भारत माता चाहती हैं

आज हमारी भारत माता चाहती हैं कि उसके पुत्रों की नस-नस में एक नवीन शक्ति का विद्युत सञ्चार हो। लोग साहसी बनें, कायरता से घृणा करें, संकीर्णता और स्वार्थपरता कायरता के चिह्न हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक शिरोधार्य करना ही साहस और वीरता है। कायर घड़ी-घड़ी मरते रहते हैं पर वीर पुरुष केवल एक ही बार मरते हैं और वह भी शानदार परंपरा स्थापित करते हुए।

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