समर्पित करें अहंकार!

समर्पित करें अहंकार!

‘‘अग्रिर्वा रुद्रस्तस्य द्वे तन्वौ घोरान्या च शिवान्या च’’। यही सूर्य रूप तपते हैं। अग्रि-इन्द्र-वरुण रूप कार्य करते हैं। सूर्य का ही नाम सत्यनारायण (विष्णु) है। विष्णु ही यज्ञ कहलाते हैं।

अग्रि-सोम-इन्द्र तीनों त्रिलोकी के अधिपति हैं। तीनों मिलकर- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र - प्राणी मात्र का अन्तरात्मा महेश्वर है। यही रुद्र है - एक घोर रूप, एक शिव रूप। यही सूर्य का जनक है। तत्व रूप में प्रत्येक शरीर में निवास करता है। इन्द्र की प्रधानता से यह महेश्वर, सोम की प्रधानता से महादेव तथा अग्नि की प्रधानता से रुद्र है। सोम रूप महान् ने वायु रूप ओज भर दिया इन्द्र में, सूर्य में ज्योति को पैदा किया। सूर्य ही जगत् का पिता कहलवाया। अध्यात्मभाव में इन्द्र का अंश सूर्य से निकलकर बुद्धि के रूप में विज्ञान आत्मा बनता है। तीन अक्षर प्राणों के योग से त्रिनेत्र या त्र्यंबक बनते हुए हृदय रूप (हृ-इन्द्र, द-विष्णु, य-ब्रह्मा) बनते हैं। पुराणों में इन्द्र को महेश कहा गया है। ‘‘अग्रिर्वा रुद्रस्तस्य द्वे तन्वौ घोरान्या च शिवान्या च’’। यही सूर्य रूप तपते हैं। अग्रि-इन्द्र-वरुण रूप कार्य करते हैं। सूर्य का ही नाम सत्यनारायण (विष्णु) है। विष्णु ही यज्ञ कहलाते हैं।

सूर्य ही शिव है। चारों ओर जल समुद्र है। किरणें ही केश हैं और उनका जल ही इनको गंगाधर बनाता है। ललाट पर चन्द्रमा है, तो यह चन्द्रशेखर हैं। घोर अग्रि के द्वारा की गई जितनी भी खराबी है उसको सोम रूप से शान्त कर देता है। अत: शिव, शंकर, शंभु कहलाता है।

सूर्य प्रतिबम्ब से महत् में जीव की अहंकृति बनती है। अत: शिव को अहंकार का अधिष्ठाता कहा जाता है। चन्द्रमा तथा पृथ्वी के प्रतिबिम्ब से क्रमश: प्रकृति और आकृति बनती है। अहंकार ही बुद्धि का जनक है, जो तापधर्मा है, उष्ण है। सृष्टि कर्म में प्रकृति अहंकार - अभिमान रूप में ही कर्म करने की, फल प्राप्त करने की कामना पैदा करती है। कर्म करना तो हमारे हाथ है, फल हम पैदा कर नहीं सकते। कामना पूर्ण नहीं हो तब आवेश या क्रोध आता है। क्योंकि मन में स्वयं को सर्वोपरि मान बैठता है। कृष्ण कहते हैं कि कर्ता मत बनो। अहंकार एक ओर ठेस लगाता है, धैर्य और धृति कम करता है, प्रमाद बढ़ाता है। जीवन को भारभूत कर देता है। जीवन की मूच्र्छा है। इसी को बुद्धिनाश, विवेकशून्यता अथवा बुद्धि का आत्मयोग से वंचित हो जाना कहते हैं। बुद्धि भी तो उसी अहंकार से पैदा होती है। अहंकार से कर्ता का मिथ्या भाव जीव के चित्त में स्थान बना लेता है। उसका आत्मभाव सुप्त हो जाता है। व्यक्ति बाहरी विश्व में लीन हो जाता है।

भौतिक जीवन का लक्ष्य भोग है, आध्यात्मिक साधनों का लक्ष्य मोक्ष है। यही हमारे मन की दो धाराएं हैं। मन ही किसी धारा में फैलता है, वही सिकुड़ता है। अहंकार ही पतन की शुरुआत है। अहंकारी किसी दूसरे को नहीं, स्वयं को खत्म कर लेता है। अहंकार का कोप पीढिय़ों को भोगना पड़ता है। अहंकार ही व्यक्ति को रावण बनाता है। शिव से प्राप्त शक्ति के अहंकार से ग्रस्त होकर कैलाश पर्वत को उठाने चला था। शिव से वर प्राप्त करके भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। वैसे ही आज जनता जनार्दन से शक्ति प्राप्त करके जनप्रतिनिधि जनता को ही छीलने में जुट जाते हैं। भगवान के संहार करने का यह भी एक स्वरूप है। इससे मुक्त भी वे ही कर सकते हैं। वे ही अग्रि-सोम अद्र्धनारीश्वर हैं, सृष्टि स्वरूप हैं। सम्पूर्ण सृष्टि शिव रूप है, शिवमय है। चूंकि सूर्य ही आशुतोष है, अत: प्रतिदिन शिवरूपी सूर्य का ही पूजन किया जाता है। चूंकि अहंकार एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। अत: इससे मुक्त होने के लिए श्रम के साथ तप की भी आवश्यकता होती है। स्वयं सूर्यनारायण निरंतर तपते हैं। नए स्वरूप को (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) प्राप्त करने के लिए भीतर जगह बनानी पड़ती है। प्राणों को बाहर प्रतिष्ठित करना, अपने प्राणों का समर्पण करना ही तप है।

हमें स्वयं को रिक्त करना है उन सभी उपाधियों से जो अन्य लोग हमें देते हैं - नाम, धर्म, प्रशंसा, धन, ज्ञान, यश आदि। ‘मैं’ का समर्पण बिना दृढ़ संकल्प के, तपन के संभव नहीं है। महाशिवरात्रि पर्व इसी संकल्प को दोहराने, आत्मशुद्धि करके भीतर शिव रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का पर्व है। आइए! हम सब मिलकर शिव (सूर्य) से प्रार्थना करें कि ‘जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान मन सुषुप्ति अवस्था में सोते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूर तक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत्र आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।’

यज्जाग्ग्रतो दूरमुदैतिदैवन्तदुसुप्प्तस्यतथैवैति।।
दूरङ्गमञ्ज्योतिषाञ्ज्योतिरेकन्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।

‘‘कर्मानुष्ठान में तत्पर बुद्धिसम्पन्न मेधावी पुरुष यज्ञ में जिस मन से शुभ कर्मों को करते हैं, प्रजाओं के शरीर में और यज्ञीय पदार्थों के ज्ञान में जो मन अद्भुत पूज्य भाव से स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पवान् हो।’’

येनकर्म्माण्यपसोमनीषिणोयज्ञेकृण्वन्तिव्विदथेषुधीरा:।।
यदपूव्र्वंय्यक्षमन्त: प्प्रजानान्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु।।६।।

आज देश को शिव रूप कल्याणकारी संकल्प की अत्यन्त आवश्यकता है। चारों ओर अहंकार, अपराध, अनर्गल-मर्यादाहीन आचरण के प्रकोप बढ़ रहे हैं। लंका किसी को जलती हुई दिखाई नहीं पड़ रही। बिना आध्यात्मिक धरातल के प्रज्ञा शून्य हो रहा है शिक्षित वर्ग भी। सींचने का कार्य, निर्माण कार्य शीतलता से, प्रेम की आहुति से, प्राणों की तपन से होता है। शिव से आज संकल्प की दृढ़ता मांगें! नमो शिवाय:!

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